जीव का मन जगदीश में लगाना चाहिए
सांईधाममंदिर प्रांगण में चल रही श्रीमद् भागवत कथा के दूसरे दिन रविवार की कथा को प्रारंभ करते हुए कथा वाचक शैलेन्द्र व्यास ने बताया कि भगवान की भक्ति भोग विलास प्राप्त करने के लिए नहीं वरन् भगवान को ही प्राप्त करने के लिए होनी चाहिए।
कर्दम ऋषि की तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान ने उन्हें पुत्र रूप में अपने आप को देने की कथा सुनाते हुए बताया कि कर्दम ऋषि एवं देवाहुति के यहां भगवान कपिल देव ने अवतार लिया, भगवान कपिल देव के जन्म के पश्चात कर्दम ऋषि के संन्यास लेने एवं भगवान द्वारा माता देवाहुति को इस बात का ज्ञान दिया गया कि जीव जब तक अपने मन को जगत में लगाए रखता है, तब तक जीव बंधन में रहता है वहीं जीव जब अपने मन को जगदीश में लगा देता है, तो वहीं मन उसके मोक्ष का कारण बन जाता है। नवधा भक्ति, सांख्य शास्त्र, विवेक के द्वारा मोक्ष की प्राप्ति का ज्ञान दिया गया और बताया कि जीव किन-किन कारणों से नरकगामी होता है और जीव को किस कारण मनुष्य देह प्राप्त होती है।
उतानपाद के वंश परंपरा की कथा में बताया कि जब व्यक्ति भोगवादी होकर भोगों में रूचि बढ़ाता है तो नीति से विमुख हो जाता है। विवेकहीन हो जाता है। उतानपाद राजा भी जब अपनी प|ी सुरुचि में अधिक अशक्त हो गया तो अपनी बड़ी प|ी सुनीति का त्याग कर दिया और विवेकहीन होने के कारण सुरुचि द्वारा ध्रुव का किया गया अपमान भी देखता रहा। ध्रुव चरित्र की कथा को विस्तार से सुनाते हुए बताया कि ध्रुव ने 6 वर्ष की आयु में ही पांच माह तक कठोर तपस्या से भगवान नारायण के दर्शन वरदान प्राप्त कर लिए और ध्रुव पद प्राप्त किया।
ध्रुव वंश की कथा को सुनाते हुए बताया कि राजा अंग के वंश में भारी पाप स्वरूप वेन नाम का पुत्र हुआ जिससे संपूर्ण प्रजा दुखी हुई अंततः ब्राह्मणों की हुंकार से उसे मरना पड़ा, वेन के शरीर से जांघ को मथने से निषाद जाति के पुरुष का जन्म हुआ और वेन के भुजाओं को मथने से एक पुरुष एवं स्त्री युग्म का प्रागट्य हुआ वही भगवान नारायण एवं लक्ष्मी के स्वरूप में राजा पृथु अर्चि महारानी हुए, राजा पृथु ने ही इस पृथ्वी को समतल किया और जीवों को रहने के लिए उचित स्थान प्रदान किया। ऋषभ देव रूप में अवतार लिया। भगवान ऋषभ देव की विस्तार से कथा सुनाते हुए द्वितीय दिवस की कथा को विश्राम दिया गया।
जैसलमेर. सांईधाममें चल रही भागवत कथा सुनाते कथा वाचक शैल