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सुदामा चरित्र सुनकर भावुक हुए भक्त

7 वर्ष पहले
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पुष्करणाभवन में चल रही भागवत कथा के सातवें दिन रुकमणी विवाह के साथ कथा प्रारंभ की गई। कथा वाचक चन्द्रदत्त सुबेदी ने कहा कि कृष्ण भक्तों का कल्याण करने के लिए ही अवतार लेते है। भगवान अजन्मे और अकर्ता है। उनके चरित्रों और आदर्शों को प्राप्त कर भक्त इस संसार रुपी भवसागर को पार करता है। भगवान ने रुकमणी हरण के बाद जामवंती, सत्यभामा, कालिंदी, मित्रविन्दा, सत्या, भद्रा, और लक्ष्मणा के साथ विवाह किया। साथ ही भौमासुर की जेल में कैद 16 हजार 100 कन्याओं का भी भगवान ने वरण किया।

कथा के अंत में सुदामा चरित्र की कथा का वर्णन किया गया। साथ ही सुंदर सजीव झांकी भी प्रस्तुत की गई। सुदामा की पोटली में उसकी प|ी ने केवल चावल ही रखे थे। उन्होंने कहा कि राजा, ज्योतिषि, और संत के पास कभी भी खाली हाथ नहीं जाना चाहिए। सुदामा ने अपनी इन्द्रियों को वस में कर रखा था। जो कुछ प्राप्त था उसी से जीवन निर्वाह करते थे। इस प्रकार उनमें दीनता का भाव है। सुबेदी ने कहा कि जितनी भी कथाएं होती है उनका एक ही सारांश है कि सभी भगवान का स्मरण करते रहे। भगवान भजनीय है क्योंकि उन्होंने कभी क्रोध ही नहीं किया। भ्रगु जी की लात को सहन करके भी उन्होंने बड़े विनम्र भाव से उनसे पूछा। पृथ्वी का भार यद्यपि कौरव पांडवों के युद्ध से कम हो गया था फिर भी यदुवंश के क्षय के लिए ब्राह्मण को चुना गया। यदुवंशियों का पतन तो उनके द्वारा किए गए मदिरा पान से हुआ। कथा के समापन पर आरती की गई तथा शोभायात्रा के साथ भागवतजी को मदन मोहनजी के मंदिर पहुंचाया गया। रास्ते में श्रद्धालु भजन कीर्तन करते हुए चल रहे थे।

भागवत कथा के समापन पर निकाली शोभायात्रा

जैसलमेर. भागवत कथा के समापन पर निकाली शोभायात्रा।