पाएं अपने शहर की ताज़ा ख़बरें और फ्री ई-पेपर

डाउनलोड करें
  • Hindi News
  • नहरों से रेत निकालने के नाम पर करोड़ों खर्च, नतीजा िमट्‌टी

नहरों से रेत निकालने के नाम पर करोड़ों खर्च, नतीजा िमट्‌टी

6 वर्ष पहले
  • कॉपी लिंक
प्रतिवर्षकरोड़ों रुपए नहरों की सिल्ट सफाई के लिए खर्च किए जाते हैं। खर्च होने के बाद भी अंतिम छोर पर बैठा किसान पानी के लिए तरसता है। वहीं समय पर शिल्ट निकालने का काम शुरु नहीं होने के कारण भी किसानों की बारियां पिट जाती है। इस वर्ष अभी तक नहरों से सिल्ट निकालने के नाम पर करीब 5 करोड़ रुपए से अधिक खर्च हो चुके है, लेकिन अधिकांश नहरों की सिल्ट नहीं निकली है। वहीं विभागीय अधिकारियों की मनमानी समय पर डिसिल्टिंग का कार्य नहीं होने के कारण भी यह मामला विवादों में रहता है। किसान आरोप लगाते है कि समय पर डिसिल्टिंग नहीं होती है। वहीं नहरों माइनरों में पानी चलने के बाद पता भी नहीं चल पाता है कि सिल्ट निकाली है या नहीं।

क्याहै सिल्ट

जैसलमेरइंदिरा गांधी नहर परियोजना का अंतिम छोर है। नहर के साथ बह कर आने वाला कचरा रेत यहां आकर रुक जाते है। जिससे नहरों से माइनरों खालों में पूरी क्षमता से पानी प्रवाहित नहीं हो पाता है। इस लिए प्रतिवर्ष नहर विभाग द्वारा करोडों रुपए इस काम के लिए खर्च किए जाते हैं। साथ ही जैसलमेर रेगिस्तानी इलाका है। जिसके चलते मई से जुलाई तक चलने वाली आंधियों की रेत भी माइनरों में भर जाती है। इस दौरान मानइरों में पानी नहीं होता है। कहीं-कहीं तो माइनर खाले रेत में ही दब जाते हैं।

करीबचार करोड़ रुपए खर्च

नहरीविभाग ने वर्ष 2014-15 में नहरों से मिट्टी निकालने के लिए करीब पांच करोड़ की राशि खर्च की है। करीब इतनी ही राशि पिछले कई सालों से मिट्टी निकालने के नाम पर खर्च होती है। जिले में कुल 3 हजार किमी की नहरें माइनर है। जिनमें आंधियों की सीजन में रेत जमा हो जाती है। यह कार्य पूरे साल निरंतर चलता रहता है। इस वर्ष में नहरी विभाग ने ठेकेदारों के माध्यम से 2.94 करोड रुपए मिट्टी निकालने पर खर्च किए है। विभागीय मशीनरी द्वारा मुख्य नहरों से मिट्टी निकालने पर 2.88 करोड रुपए खर्च किए हैं।

माइनरोंपर नहीं लगे हैं पौधे

नहरोंसे सिल्ट निकालने के नाम पर इतनी बड़ी राशि खर्च होने के पीछे विशेषज्ञ यह भी कारण मानते है कि माइनरों के किनारे अभी तक पेड़ नहीं लगाए गए है। हर माइनर के पास अनिवार्य 30 फीट का पटरा 100 फीट की वन पट्टी होती है। लेकिन नहर बने करीब 30 वर्ष से अधिक समय हो गया है उसके बाद भी सभी मानइरों के किनारे पौधे नहीं लगे है। अगर नहर के किनारे पेड़ लगे होते तो इतनी बड़ी मात्रा में रेत उडकर नहरों में नहीं आती। वही डिसिल्टिंग के लिए भी इतनी बड़ी राशि खर्च करने की जरुरत नहीं पड़ती। नहरों के आसपास पौधरोपण के लिए जिले में वन विभाग, नहर विभाग, के साथ ही ईटीएफ पर्यावरण सेना भी है।

समयपर शुरू नहीं होती प्रक्रिया

किसानोंको भी विभाग से शिकायत रहती है कि समय पर रेत निकालने की प्रक्रिया शुरु नहीं होती है। हर साल अक्टूबर-नवम्बर में सिल्ट निकलती है। इसी दौरान नहरों में पानी आता है। वहीं इससे पहले मई से जुलाई तक आंधियों का सीजन रहता है। इसलिए भी सिल्ट नहीं निकल पाती है। लेकिन जब पानी आने की बारी शुरु हाेती है उसी दौरान विभाग भी रेत निकालने में लगता है। ऐसे में कई बार रेत के कारण पानी नहीं पहुंचता है। जिससे किसान भी परेशान रहते है। वहीं मानइरों में पानी आने के बाद यह नहीं कहा जा सकता है कि रेत निकाली गई है या नहीं।

अभीभी नहीं निकली रेत

डीडीएममाइनर, जीडब्लू एम माइनर, एचडब्लूएम माइनर, एलडब्लूएम माइनर सहित अन्य माइनर खालों में रेत भरी है।



^नहरोंसे सिल्ट निकालने की प्रक्रिया हमेशा ही संशय में रही है। हर साल करोड़ों खर्च होते हंै। फिर भी समय पर सिल्ट नहीं निकलती है। पानी आने के साथ ही डिसिल्टिंग का काम शुरु होता है। ऐसे में एक बार नहर में पानी चल गया उसके बाद यह कहा भी नहीं जा सकता है कि सफाई हुई थी या नहीं। प्रेमसिंहपरिहार, किसान नेता

^नहरोंसे सिल्ट निकालनी आवश्यक है। रेत के कारण माइनर नहरें दब जाती है। यह प्रक्रिया हर साल संपादित की जाती है ताकि किसानों को पूरा पानी पहुंचाया जा सके। रामअवतार मीणा, एसई, इंगानप स्टेज 3