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पेज 15 का शेष...

6 वर्ष पहले
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जैसलमेरमें मजदूरी करने वाले यह सभी सदस्य गत 1 फरवरी को अपने गांव बलुंदा में मतदान करने के लिए रहे थे। इस दौरान जोधपुर जिले के कुड़ी के समीप हुए हादसे में 12 जनों की मौके पर ही मौत हो गई थी। इनमें 11 बलूंदा गांव के थे। साथ ही 15 जने गंभीर रूप से घायल हो गए थे। मृतकों के भरोसे ही उनके परिवारों में सुबह-शाम का चूल्हा जलता था। ऐसी स्थिति में समूचा गांव एकजुट होकर इन परिवारों को संभालने में हर संभव सहयोग कर मदद की अनूठी मिसाल पेश कर रहा है।

पीपाड़के व्यापारी भी आए मदद को : पीपाड़के सब्जी मंडी व्यापार संघ द्वारा प्रत्येक परिवार को 5-5 हजार रुपए की सहायता राशि दी गई। इसी गांव में राशन की दुकान चलाने वाले मेवाराम गुर्जर ने भी अपनी तरफ से सभी को 5-5 हजार नकद तथा एक-एक गेहूं की बोरी दी है।

ग्रामीणोंने जुटाए 4 लाख : घटनाको लेकर पीड़ित परिवारों की सहायता करने में गांव वालों में भी जज्बा देखा जा रहा है। ग्रामीणों ने रविवार तक कुल 4 लाख रुपए की सहयोग राशि एकत्रित की है।

घटनाके दिन बाद पहुंची सरकार की मदद : जैतारणतहसीलदार रविवार को बलुंदा पहुंचे तथा उन्होंने मृतक परिवारों को सीएम सहायता काेष से 50-50 हजार रुपए की सहायता राशि के चेक प्रदान किए। साथ ही घायल परिवारों को भी सहायता राशि प्रदान की गई।

शहरमें आई...

अबखुद किराए के मकान में रहकर पेंशन से जीवनयापन कर रहे हैं। पेंशन से जोड़ी गई ज्यादातर राशि भी भी वे अस्पताल के लिए दे चुके हैं। सांफाड़ा रोड पर हॉस्पिटल का शिलान्यास तो बीते साल 8 दिसंबर को ही हो गया था। लेकिन जमीन की टेस्टिंग रिपोर्ट अब मिली है। अब इस हॉस्पिटल का निर्माण होगा।

जर्मनसहित कई भाषाओं विषयों का ज्ञान : डाॅ.बोहरा जर्मन भाषा का भी गहन अध्ययन कर चुके हैं। आध्यात्मिक विचारधारा वाले डॉ. बोहरा की फिजिक्स के अलावा एस्ट्रोनॉमी एस्ट्रोलॉजी में भी अच्छी खासी पकड़ है। इन विषयों पर उनके लिखे कई आलेख गूगल तथा हेमिल्टन यूनिवर्सिटी के एस्ट्रोलॉजिकल जनरल पब्लिकेशन में उपलब्ध हैं।

बेटीकी शादी कर दी, भरा-पूरा परिवार : डॉ.बोहरा की प|ी शांतिदेवी का निधन डेढ़ साल पहले ही हुआ है। एकमात्र बेटी की शादी भी जयपुर में हुई है। कुल छह भाई थे जिनमें दो का निधन हो चुका है। उनके भाई इंजीनियर ग्रेनाइट व्यवसायी धनपत बोहरा ने बताया कि भाईसाहब बचपन से ही दार्शनिक विचारधारा के हैं। हम जब कभी भी सपरिवार कहीं घूमने जाते तो पूरा परिवार नेचुरल स्पॉट पर एन्जॉय करता। भाई साहब किसी मंदिर या ऐतिहासिक स्थल को निहारते रहते। हम उनसे पूछते तो हंसकर यही कहते कि दुनिया में कितने महान लोग हुए, मगर गए सब खाली हाथ। जीवन का अंतिम सच यही है।