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िवषैला सांप काटे तो झाड़फूंक से जान बचना नामुमकिन
जिलेमें सर्पदंश के मामले अधिकांशत: हर साल वर्षा ऋतु में ही सामने आते हैं। सरकारी अस्पतालों में उपचार कराने के बजाय धार्मिक आस्था और विश्वास के चलते ज्यादातर पीड़ितों को लोकदेवताओं की शरण में पहुंचाया जाता है। जहां झांड-फूंक (बंध) के चक्कर में पीड़ितों की असामयिक मौत हो जाती है। जबकि चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विभाग की ओर से जिला उपखंड स्तरीय सरकारी अस्पतालों में सर्पदंश की दवा उपलब्ध कराई हुई है, मगर जागरूकता के अभाव में पीड़ितों का लोग उपचार नहीं करा पाते हैं।
भले ही डॉक्टर को धरती का भगवान माना जाता हो, मगर करौली जिले के पिछड़े डांग क्षेत्र के लोग आज भी अंधविश्वास के चलते लोकदेव के थानकों पर ही अधिक विश्वास करते हैं। इन लोकदेव स्थलों पर हर साल लगने वाले वार्षिक मेलों में सर्पदंश अन्य जहरीले कीटों के काटने पर बंध लगवाने खुलवाने के लिए उमड़ी भीड़ यही दर्शाती है। ग्रामीण इलाकों में ज्यादातर वर्षाकाल में अंधेरी रात में सांप के काटने और खेती कार्य के दौरान मौत होने के मामले सामने आते हैं। दूसरा कारण राज्य सरकार की ओर से कृषकों के हित में संचालित आर्थिक सहायता योजना भी हैं। कई महिला-पुरुषों की सामान्य मौत होने पर भी खेती कार्य के दौरान सर्पदंश होना बताया जाता है। कृषि उपज मंड़ी में ऐसे मामलों में सहायता के आवेदनों की भरमार होने पर प्रशासनिक स्तर पर अब पुलिस की प्राथमिकी रिपोर्ट चिकित्सक उपचार तथा मृतक का पोस्टमार्टम होना आवश्यक कर दिया है। जिले में सर्पदंश से मौत होने के मामले में कलेक्टर डॉ.बी.एल.जाटावत ने सभी चिकित्सालयों में उपचार दवा की उपलब्धता रखने के निर्देश दिए हुए हैं। करौली हिंडौन के राजकीय अस्पतालों में सर्पदंश के उपचार की दवा इन दिनों पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध है।
सर्पदंशसे कइयों की मौत, अस्पतालों में नहीं है उपचार की व्यवस्था
मासलपुर| मासलपुरडांग क्षेत्र में आये दिन सर्पदंश से पीड़ितों को इन दिनों जिन्दगी और मौत के साये में गुजरना पड़ता है। मासलपुर में सामुदायिक स्वास्थ केंद्र है पर सर्प के काटने के उपचार की व्यव्स्था नहीं है। इससे ग्रामीणों को खासी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है।
गौरतलब है कि मासलपुर पहाड़ी क्षेत्र है, यहां के गांवों में बिजली की लचर व्यवस्था है, जबकि रोड लाइटों के अभाव के चलते सायं ढलते ही रास्तों में अंधेरा छा जाता है। ऐसे हालात में