मेरी स्वप्नों की निधि अनंत, मैं ऋतुओं में न्यारा वसंत...
स्वप्न से किसने जगाया? मैं सुरभि हूं। छोड़ कोमल फूल का घर ढूंढती हूं कुंज निर्झर। पूछती हूँ नभ धरा से- क्या नहीं ऋतुराज आया? मैं ऋतुओं में न्यारा वसंत मै अग-जग का प्यारा वसंत। मेरी पगध्वनि सुन जग जागा कण-कण ने छवि मधुरस मांगा। नव जीवन का संगीत बहा पुलकों से भर आया दिगंत। मेरी स्वप्नों की निधि अनंत मैं ऋतुओं में न्यारा वसंत।
कुचामन सिटी. बसंत पंचमी की पूर्व संध्या पर कुचामन से पांच-सात किमी दूरी एक खेत में लहलहाती सरसों की फसल फोटोलक्ष्मण कुमावत, कुचामन सिटी