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चीफ वाइल्ड लाइफ वार्डन ने कहा मोरों को जलाया जाना चाहिए था

7 वर्ष पहले
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मोरों को दफनाना बड़ी गलती माना

आदेश

{सभी मंडलों में जारी करेंगे इस संबंध में आदेश

भास्करन्यूज | भीलवाड़ा

मृतमोरों को वन विभाग द्वारा गाड़े जाने का मुद्दा दैनिक भास्कर द्वारा उठाए जाने के बाद वन मंत्रालय एवं मुख्यालय तक में हलचल मच गई है। वन मंत्री के आदेश के बाद चीफ वाइल्ड लाइफ वार्डन ने मेवाड़ मिल में मारे गए मोरों को गाड़ने के मामले की जांच शुरू करते हुए जानकारी जुटाई। उन्होंने इसे वन विभाग की गंभीर चूक माना।

उन्होंने दैनिक भास्कर को दूरभाष पर बताया कि अनुसूची प्रथम के वन्यजीवों में शामिल है मोर और इसे गाड़ा नहीं जा सकता। भास्कर ने यह मुद्दा उठाकर इस मामले की गंभीरता की ओर विभाग का ध्यान दिलाया है। मुख्यालय से भी सभी वन मंडलों एवं क्षेत्रीय वनाधिकारियों को इस नियम से संबंधित परिपत्र जारी किया जा रहा है। ताकि ऐसी गलती दोबारा हो। उन्होंने कहा कि वर्षों पूर्व ऐसा नियम रहा होगा जिसमें पक्षियों को जलाने और गाड़ने दोनों का विकल्प हो, लेकिन ताजा नियम तो यही है कि इनका दाह संस्कार ही किया जाए। उन्होंने कहा कि शायद अधिकारी कन्फ्यूज होंगे। मामले के संबंध में अधिकारियों से बातचीत की जाएगी और कार्यवाही करेंगे। मोरों को वापस निकालकर जलाया भी जा सकता है।

बने रहे अनजान

मामलेमें विभागीय अधिकारी नियमों के अनजान बनते रहे। भास्कर द्वारा मामले को प्रमुखता से उठाया गया तो जांच शुरू हुई और अधिकारियों ने माना कि मोरों को दफनाना गलत था, इन्हें जलाया जाना चाहिए था। भास्कर ने रेंजर से लेकर प्रधान मुख्य वन्यजीव संरक्षक से मामले पर बात की तो कोई ठीक से जवाब नहीं दे पाया।

यह था मामला

मेवाड़मिल में 23, 24 29 नवंबर को मोरों के 23 शव मिले थे। विभाग ने आरजिया हरणी महादेव नर्सरियों में इन्हें दफना दिया। जबकि वर्ष 2002 में जारी नियम के अनुसार इन्हें दफनाना नहीं जलाना था। भास्कर ने 7 दिसंबर को ‘विवाद बना मोरों को दफनाना’ शीर्षक से खबर प्रकाशित की। इसके बाद वन महकमें में हड़कंप मचा।

7 दिसंबर को प्रकािशत खबर

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