बढ़ती गर्मी थामने का निर्णायक वक्त
न्यूयॉर्क सहितपश्चिम के दर्जनों शहरों में रविवार को दुनिया में गर्मी बढ़ाने वाले कार्बन उत्सर्जन को कम करने के ठप पड़े प्रयासों के विरोध में हजारों लोग उमड़ पड़े। यह जनता के स्तर पर पैदा हो रही पर्यावरण-जागरूकता का सबूत है। इन प्रदर्शनों में वैज्ञानिक पर्यावरण संगठनों के कार्यकर्ता तो थे ही मजदूर तथा धर्म गुरु तक शामिल थे। यह प्रदर्शन संयुक्त राष्ट्र में जलवायु पर होने वाले शिखर सम्मेलन के दो दिन पहले हुआ है, जिसमें वैश्विक सहमति का ढांचा तय होने की उम्मीद है। यदि ऐसा हुआ तो अगले साल पेरिस में होने वाले शिखर सम्मेलन में समझौता लागू हो जाएगा, लेकिन सहमति होना इतना आसान नहीं है। गर्मी बढ़ाने वाली गैसों अर्थात ग्रीनहाउस गैसों में बहुत ज्यादा कटौती का मतलब है कोयला, पेट्रोल और प्राकृतिक गैस के उपयोग में व्यापक कमी। इन गैसों का उत्सर्जन करने वालों में चीन सबसे ऊपर है और उसके बाद अमेरिका भारत का नंबर आता है। इन तीनों देशों में ऊर्जा के उपयोग में ऐसे किसी परिवर्तन पर राजनीतिक सहमति नहीं है। भारत और चीन जैसे देशों के लिए कोयला ऊर्जा जरूरतें पूरी करने और अर्थव्यवस्था को गति देने का सबसे सस्ता जरिया है। तीन साल पहले इसी तरह की पाबंदियों के चलते कनाडा क्योटो प्रोटोकॉल से बाहर हो गया था। कनाडा की ऑइल सैंड्स इंडस्ट्री तेजी से बढ़ता रोजगार आमदनी का बड़ा स्रोत है और ग्रीनहाउस गैसों की कटौती के लिए वह इस पर किसी तरह की मर्यादा नहीं लाना चाहता। इसके विपरीत यूरोप और 43 द्वीप देशों का समूह पूरी कोशिश में लगा है कि किसी तरह तापमान को औद्योगिक क्रांति के समय के स्तर पर रखा जा सके, क्योंकि गर्मी बढ़ने के साथ समुद्र स्तर में वृद्धि का इन्हीं देशों पर सबसे ज्यादा खतरा है। कई द्वीप देशों में तो पहले से ही ताजा पानी की सप्लाई, मत्स्य उद्योग और कृषि पर जलवायु परिवर्तन का असर दिखने लगा है। इस साल संयुक्त राष्ट्र की जलवायु परिवर्तन संबंधी अंतर्सरकारी पैनल ने बताया था कि तापमान वृद्धि को 2 डिग्री से नीचे रखने के लिए 2050 तक ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को 40 से 70 प्रतिशत कटौती करनी ही होगी। अन्य वैज्ञानिक शोध भी खतरे के संकेत दे रहे हैं। 2013 में वायुमंडल में ग्रीनहाउस गैसों की मौजूदगी सर्वाधिक रही, क्योंकि अब समुद्र भी पर्याप्त कार्बन डाइऑक्साइड नहीं सोख पा रहा है। जाहिर है मिल-जुलकर साहसी कदम उठाने का