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सारदा घोटाले से सबक लेना होगा

7 वर्ष पहले
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सारदा चिटफंडघोटाले की आंच शुक्रवार को पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के मंत्रिमंडल तक जा पहुंची, जब सीबीआई ने राज्य के परिवहन मंत्री मदन मित्रा को गिरफ्तार कर लिया। उन पर आपराधिक साजिश और धोखाधड़ी के आरोप हैं। राज्य में सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस के लिए यह बड़ा झटका है, क्योंकि इस मामले में दो सांसदों सहित तीन बड़े नेता पहले ही सलाखों के पीछे पहुंच गए हैं। पार्टी नेता ममता बनर्जी इस गिरफ्तारी से बौखला गईं हैं। उन्होंने राज्य सरकार को विश्वास में लिए बिना की गई गिरफ्तारी को केंद्र की गुंडागर्दी करार दिया है। दरअसल, तृणमूल नेताओं के लिप्त होने से मामले ने राजनीतिक रंग ले लिया है, इसलिए मूल मुद्‌दे से ध्यान भटकने की आशंका है। सुप्रीम कोर्ट ने मामले के अंतरप्रांतीय और अंतरराष्ट्रीय पहलुओं को देखकर ही इसकी जांच सीबीआई को सौंपी थी। मुद्‌दा हमारी आर्थिक प्रणाली की पहुंच होने का है। पश्चिम बंगाल के ग्रामीण क्षेत्रों में लोगों के पास बचत लायक पैसा रहता है, लेकिन बैंकिंग ढांचे की व्यापक पहंुच होने के कारण लोग स्थानीय सूदखोरों के चंगुल में फंसने लगे। राज्य सरकार ने कई कानून लाकर सूदखोरों पर तो लगाम लगाई, लेकिन समानांतर व्यवस्था खड़ी नहीं की। निवेश के लिए लोग डाकघर योजनाओं का सहारा लेने लगे, लेकिन उसमें रिटर्न कम मिलता था। इस खाली स्थान ने कई पांजी योजनाओं को प्रोत्साहित किया। पिछली सदी की शुरुआत में अमेरिका में चार्ल्स पांजी नाम के व्यक्ति ने छोटे निवेशकों को बड़े रिटर्न का लालच देकर काफी निवेश इकट्‌ठा कर लिया था। ऐसी योजनाओं को उसी के नाम से जाना जाता है। इसमें नए निवेश का आते रहना जरूरी है। जहां नया निवेश घटा कि योजना दम तोड़ देती है। सारदा फंड में यही हुआ। जाने-अनजाने इसमें कुछ राजनेता भी गए। समझा जाता है कि फंड में 17 लाख जमाकर्ताओं का 200 से 300 अरब रुपया फंसा है। सरकार को यह नुकसान हुआ कि छोटी बचत कम होने लगी और वह राशि कम हो गई, जिसमें से जरूरत पड़ने पर सरकार उधार ले सकती थी। जहां विकास के लिए पैसा कम मिला वहीं, अंदेशा है कि यह पैसा बांग्लादेश के आतंकी गुटों तक पहुंच गया। मामले में राजनीति करने की बजाय व्यवस्थित जांच के बाद हमारी अर्थव्यवस्था की खामियां दूर कर उसे पुख्ता करने की जरूरत है।

संपादकीय