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कांग्रेस की अंदरूनी लड़ाई ने जिताया भाजपा को

6 वर्ष पहले
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पॉलिटिकल रिपोर्टर | भीलवाड़ा

गांवोंमें हमेशा से कांग्रेस का दबदबा रहा है लेकिन इस पंचायत चुनाव में कांग्रेस के दिग्गज नेताओं की लड़ाई ने पार्टी के खाते में पांच सीटों का नुकसान लिख दिया। इस कमजोरी का फायदा भाजपा को हुआ जिसकी प्रधान की सीटें पिछले चुनाव से ढाई गुना बढ गई जबकि कांग्रेस सात प्रधानों से दो पर ही सिमट कर रह गई। चुनाव में कांग्रेस एक बार भी टीम के रूप में खड़ी नजर नहीं आई। जिससे जिला प्रमुख की कुर्सी और पांच पंचायत समितियां हाथ से निकल गईं। इधर, भाजपा ने चुपचाप अपना काम किया और कांग्रेस के वोट बैंक पर भी कब्जा जमा लिया। पूरे चुनाव में कैसे-क्या समीकरण बदले इसे समझाती दैनिक भास्कर की एक रिपोर्ट।

भाजपा में जीत के हीरो

वीरमदेवसिंह

जिलाप्रभारी होने के नाते डेढ़ महीने तक यहीं डेरा डाले रहे। चुनाव से पहले जिले की गणित समझकर टिकट बांटे और कार्यकर्ताओं को सक्रिय कर दिया।

कालूलालगुर्जर

जिलाप्रमुख पद के लिए रणनीति ऐसी बनाई कि कांग्रेस से छीनकर पार्टी के खाते में डालने में सफल रहे। मुख्य सचेतक गुर्जर सुवाणा और मांडल में खुद की पैठ के कारण प्रधान बनाने में सफल हुए।

सुभाषबहेड़िया

सांसदहोने के नाते पंचायत समिति सदस्य जिला परिषद सदस्य के टिकट बांटने में ज्यादा रुचि नहीं ली लेकिन हर ग्राम पंचायत में अपने नेटवर्क को सक्रिय किया।

शिवजीराममीणा

खुदचुनाव लड़ने के बावजूद संगठन को पूरा समय दिया। टिकट वितरण में सभी नेताओं को संतुष्ट रखा।

कांग्रेस में हार का ठीकरा

केसीविश्नोई

पार्टीने केसी विश्नोई को पर्यवेक्षक नियुक्त किया था। दिग्गज नेताओं की लड़ाई में उलझने निर्णय नहीं लेने से बचते रहे।

रामलालजाट

गहलोतसरकार में कभी पावरफुल मंत्री रहे रामलाल जाट केवल हुरड़ा जिप के वार्ड 12 तक सीमित रहे। जहां से मंत्री रहे उस मांडल पंस में प्रधान नहीं बना पाए।

अनिलडांगी

सीटके जुगाड़ में लगे रहे। शहर से नाम कटाकर गुरलां में जुड़वाया लेकिन पार्टी ने मांडलगढ़ से टिकट दे दिया। वे वहां बिजी रहे

रामपालशर्मा

जिसटीम की आर-आर (रामपाल और रामलाल) के नाम से प्रदेश में चर्चा थी वह टूटने से कांग्रेस को नुकसान हुआ। इस चुनाव में सुवाणा पंचायत समिति में ही उलझकर रह गए।

1. उजागर नहीं होने दिया अंदरूनी कलह

भाजपामें अंदरूनी कलह भी रहा लेकिन स्थानीय नेताओं ने चुनाव में इसे जगजाहिर नहीं किया और अलग-अलग इलाके बांटकर टीम वर्क से काम किया।

2.मोदी लहर का भी रहा असर

चुनावोंमें मिल रही लगातार सफलता का असर पंचायतीराज चुनाव पर भी रहा। कांग्रेस के पास किसानों को खाद बिजली नहीं मिलने का बड़ा मुद्दा था लेकिन मोदी लहर के असर ने मुद्दे की हवा निकाल दी।

3.नई जिला कार्यकारिणी सकारात्मक संदेश

भाजपाकी नई जिला कार्यकारिणी दो महीने पहले ही घोषित हुई थी। इनमें युवा चेहरे और अनुभवी को तरजीह दी गई। इस टीम ने एकजुट होकर चुनाव में काम किया, जिससे जीत के रूप में परिणाम सामने आया। युवा टीम को कार्यकारिणी में जगह देने का पार्सकारात्मक संदेश गया।

1.दिग्गज टिकट बांटने में ही उलझ गए

कांग्रेसके दिग्गज नेता टिकट बांटने में उलझ गए। लड़ाई जगजाहिर हो गई। जिला परिषद के वार्ड 12 का असर पूरे जिले पर नजर आया जहां पर्यवेक्षक उम्मीदवार ही घोषित नहीं कर पाए। पूर्व मंत्री रामलाल जाट यूआईटी के पूर्व चेयरमैन रामपाल शर्मा के अलग होने का विपरीत संदेश गया।

2.भाजपा की कमियां नहीं बता पाए

चुनावके दिनों में खाद थाने में बंट रहा था। जगह-जगह लाठीचार्ज हुए लेकिन कांग्रेस खाद बिजली का मुद्दा नहीं भुना पाई। कांग्रेस नेता अपने चहेतों को टिकट दिलाने में उलझे रहे।

3.सुस्त दिखी जिला कार्यकारिणी

जिलाध्यक्षअनिल डांगी खुद चुनाव लड़ने में व्यस्त हो गए। इस चुनाव में शहर के बड़े नेता जो पद पर बैठे हुए हैं वे गांवों में नहीं निकले। कार्यकारिणी पूरे चुनाव में निष्क्रिय जैसी रही।