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फेर कोई बांधग्यो, घूंघरा, रेत रै...

7 वर्ष पहले
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घुघरा

रेत रै।

राजस्थानीकी मिठास और रस से भरी कविताओं से आज डॉ. अर्जुन देव चारण ने अपनी इस सबसे छोटी कविता-सा अहसास कराया। इस कविता को राजस्थानी में सबसे छोटी कविता स्वीकारा भी जाता है। नागरी भंडार की सुदर्शना कुमारी कला दीर्घा में प्रज्ञालय संस्था की ओर से आयोजित \\\"साखऔर सीख\\\' कार्यक्रमके दूसरे दिन डॉ. चारण का एकल काव्य पाठ हुआ। 1.18 घंटे में अर्जुन ने छोटी-बड़ी 26 कविताएं सुनाई।

मायड़ भाषा की सर्वोच्चता और उसकी मान्यता के स्वर डॉ. अर्जुन की हर कविता में थे। काव्य पाठ की शुरुआत उन्होंने \\\"रच\\\'रचनाकी इन पंक्तियों से की, रचणो है तो रीस मती कर, साख भरण नै राख, अजर-अमर हठोठी थारी। भूमंडलीकरण के दौर में भाषाओं के सामने आई गंभीर चुनौती उन्होंने \\\"भाषाहै तो उणरी ओळखान है\\\' पंक्तियोंसे बताई। इसी कविता में जब उन्होंने \\\"कांईहुवै जद काळी कोयल, बोलण लागे कागळां दाई, शेर भूसण लागै\\\' पंक्तियांपढ़ी तो हर श्रोता के मन में राजस्थानी भाषा की मान्यता का सवाल स्वत: ही खड़ा हो गया।

\\\"कुर्सीकी आपरी कोई भाषा नीं हुवै\\\' पंक्तिपढ़ी तो हर श्रोता के हाथों से तालियां स्वत: बज गई। भाषा की विषमता को उजागर करने वाले कवि अर्जुन ने जब \\\"मेहबरसे तद बरसे आखर, कदैई दैखजो\\\', कविताको सुनाया तो उसमें मायड़ भाषा के लिए एक आस थी, उमंग थी, अल्लाहस था।

छोटी-बड़ी कविताओं से अपनी रसभरी वाणी से श्रोताओं से सरोकार करते अर्जुन ने अंतिम पड़ाव में ऐतिहासिक कथाओं के संदर्भ में अपनी रचनाओं से जो सवाल उठाए, उससे सभी गंभीर हो गए। \\\"उमादे\\\' पात्रको केंद्र में रखकर रची गई कविता में जब कवि ने \\\"झुकणरो अरथ हारणो नी हुवै\\\' पढ़ातो रचना के गहरे दर्शन का आभास हुआ। \\\"म्हाराबाला बाबोसा\\\' कवितासुनाते हुए जब डॉ. अर्जुन ने सवाल खड़ा किया कि \\\"बेटियांरौ भगवान न्यारौ क्यूं नी हुवै बाबाेसा\\\' तोहर श्रोता अपने को निरुत्तर समझ रहा था। सरस, सरल, सब्ज और बौधगम्य 26 रचनाओं का श्रोताओं ने जमकर आस्वाद किया।

आरंभ में हरीश बी शर्मा ने डॉ. अर्जुन देव का परिचय दिया तो संयोजक संजय पुरोहित ने उनकी सृजन यात्रा के बारे में बताया। कासिम बीकानेरी ने स्वागत भाषण दिया तो आत्माराम भाटी ने धन्यवाद दिया। प्रज्ञालय के कमल रंगा ने इस आयोजन की निरंतरता की जानकारी देते हुए अभिनंदन पत्र का वाचन किया।

सुदर्शना कला दीर्घा में \\\"साख अर सीख\\\' कार्यक्रम में कविता पाठ करते डाॅ