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क्या कभी साफ हो सकेगी गंगा?

7 वर्ष पहले
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गंगा कीसफाई के लिए 51,000 करोड़ रुपए की 18 साल चलने वाली योजना पेश करने के एक दिन बाद केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि सिर्फ उसके प्रयासों से यह काम पूरा नहीं होगा। सॉलिसीटर जनरल रंजीत कुमार ने कहा कि ‘गंगा को साफ रखने का विचार (आम जन के) अंदर से आना चाहिए।’ साथ ही गंगा बेसिन में आने वाले पांचों राज्यों उत्तराखंड, उत्तरप्रदेश, बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल की सरकारों को राजनीतिक मतभेदों से उठकर काम करना होगा। इस पर न्यायमूर्ति टीएस ठाकुर ने केंद्र और उन पांचों राज्यों की सरकारों के बीच के राजनीतिक समीकरणों का सवाल उठाया। कहा कि उन पांचों राज्यों में गैर-भाजपा दलों का शासन है। क्या वहां की सरकारें केंद्र से सहयोग करेंगी? ऐसे प्रश्न बताते हैं कि 2,500 किलोमीटर बहने वाली और करोड़ों लोगों की जीवन-रेखा मानी जाने वाली इस नदी को फिर से ‘निर्मल’ और ‘अविरल’ बनाने के रास्ते में कैसी बाधाएं हैं। स्पष्ट है कि केंद्र की ताजा कार्य-योजना भी यह भरोसा नहीं बंधा पाई है कि इस नदी को पुनर्जीवन देना अब ‘राष्ट्रीय प्राथमिकता’ बन गया है। इस महीने के आरंभ में सर्वोच्च न्यायालय ने ऐसे ही अविश्वास की अभिव्यक्ति की थी, जब उसने कहा कि नौकरशाही ढंग की योजनाओं से गंगा को साफ करने में तो 200 साल लग जाएंगे। उसके बाद केंद्र ने नई कार्य-योजना तैयार की है। इसमें तीन, पांच और दस वर्षों के तीन चरणों में गंगा की सफाई की बात कही गई है। मोटेतौर पर पहले दौर में 118 शहरों के किनारे और दूसरे चरण में 1649 ग्राम पंचायतों के किनारे गंगा को स्वच्छ रखने के उपाय इसमें बताए गए हैं। आखिरी चरण में नदी की भू-गर्भीय और पारिस्थितिकीय सेहत बहाल करने की बात है। इस काम के लिए धन जुटाना चुनौती है। अतः कार्य-योजना पेश करने के दो दिन बाद केंद्रीय मंत्रिमंडल ने फैसला किया इस कार्य का प्रबंधन वित्त मंत्री की देखरेख में एक ट्रस्ट करेगा। ट्रस्ट को चंदा देने पर टैक्स में रियायत मिलेगी, लेकिन उपरोक्त दिक्कतें कैसे दूर होंगी, यह प्रश्न बना हुआ है। इस संदर्भ में यह उल्लेखनीय है कि अतीत में कार्य-योजनाएं विफल हुईं तो उनका कारण धन की कमी नहीं था। दरअसल, गंगा की सफाई को जन-आंदोलन बनाए बिना इसमें सफलता हासिल करना मुश्किल ही है।

संपादकीय