भीलवाड़ा। भीलवाड़ा की मांडल पंचायत समिति में कांग्रेस के पास एससी महिला प्रत्याशी नहीं होने से 25 वर्षीय आशा बैरवा निर्विरोध प्रधान निर्वाचित हो गईं। आशा की राजनीतिक पृष्ठभूमि नहीं है लेकिन पढ़ाई में हमेशा टॉपर रहने और उसकी नेतृत्व क्षमता को देखते हुए भाजपा ने आशा को चुनावी मैदान में उतारा और शनिवार को वह प्रधान बन गईं।
शिक्षक बनते-बनते बन गईं प्रधान
आशा अभी भीलवाड़ा के कंचन देवी कॉलेज से बीएड कर रही है। कॉलेज से घर पहुंचने के बाद शाम को आशा मां गीता देवी का हाथ बंटाने के लिए उनके साथ मांडल बस स्टैंड पर सब्जी बेचा करती थी। छुट्टी के दिन आशा अक्सर पूरे दिन मांडल बस स्टैंड पर सब्जी ही बेचती थी। सब्जी बेचते वक्त आशा के दूसरे हाथ में किताब रहती थी। आशा का परिवार मुख्य सचेतक कालूलाल गुर्जर के संपर्क में आया और अब उनकी किस्मत बदल गई।
गांवों को स्वच्छ बनाऊंगी
आशा ने बताया कि उसकी पहली प्राथमिकता गांवों को स्वच्छ बनाने की रहेगी। गरीब परिवार की बेटियों की शिक्षा के लिए विशेष प्रयास करूंगी। आशा ने मांडल के रूपी देवी कन्या महाविद्यालय से पिछले साल बीए किया था। इस साल पीटीईटी देने के बाद उसका बीएड में नंबर गया। आशा के मन में टीचर बनने की ख्वाहिश है।
नेतृत्व और पढ़ाई में भी अव्वल आशा
आशा नेतृत्व में माहिर और पढ़ाई में हमेशा अव्वल रहीं। पिछले साल उसने बीए में कॉलेज टॉप किया। सेकंड इयर में पढ़ाई के दौरान आशा छात्रासंघ अध्यक्ष भी रहीं। छोटी उम्र में आशा ने नेतृत्व शैली सीख ली। इसी नेतृत्व क्षमता से प्रभावित होकर भाजपा ने आशा का पंचायत समिति सदस्य के लिए चयन किया।
उधारीके पैसे से पढ़ा रहे थे आशा को
आशा के पिता शंकरलाल बैरवा किसान हैं और बिल्कुल सामान्य परिवार से हैं। उनकी आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं है। माता-पिता अपना सपना पूरा करने के लिए लोगों से पैसा उधार लेकर आशा को पढ़ा रहे थे। आशा के दो छोटे भाई एक बहन हैं। आशा परिवार में सबसे बड़ी संतान है।
सबसे कम उम्र की प्रधान 21 साल की घीसी
हुरड़ा में ऐसी शख्स प्रधान बनी हैं जिसके परिवार का आज तक राजनीति से कोई लेना-देना नहीं रहा। टोंकरवाड़ ग्राम पंचायत के शिवपुरा मजरा में रहने वाली 21 वर्षीय घीसी भील कांग्रेस के टिकट से पंचायत समिति सदस्य का चुनाव लड़ी थीं और शनिवार को वह प्रधान बन गईं। घीसी अभी प्राइवेट बीए सेकंड इयर की पढ़ाई कर रही थीं। घीसी के पिता नानूराम भील गरीब किसान हैं। माता हीरू देवी उनका हाथ बंटाती है।
घीसी की नियमित पढ़ाई की तमन्ना थी लेकिन परिवार की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं होने से पिता घीसी को रेगुलर नहीं पढ़ा सके लेकिन उसके सपने पूरे करने के लिए खेती में जी तोड़ मेहनत करके पैसे जुटाए और उसे प्राइवेट पढ़ा रहे थे।
कुछ दिनों पहले कांग्रेस नेता पंचायत समिति सदस्य का चुनाव लड़ाने के लिए घर आए तो एक बार तो पूरा परिवार चौंक गया। प्राइवेट पढ़ाई के कारण घीसी दिनभर घर पर ही रहती थी। पढ़ाई के बाद खाली बचे समय में वह माता-पिता के साथ खेती ही करती थी। खेत से लकड़ी लाना, फसल काटना, माता-पिता देरी से खेत से घर आए तो उनके लिए खाना पकाकर तैयार रखना ही अब तक घीसी का जीवन था।
अब तक घीसी राजनेताओं के बारे में सुनती ही थी लेकिन शनिवार को वह खुद प्रधान बन गईं। घीसी को नौ वोट भाजपा प्रत्याशी ममता भील को छह वोट मिले। चुनाव के दौरान एसटी महिला प्रत्याशी ढूंढ़ने के दौरान ही घीसी का परिवार पूर्व मंत्री रामलाल जाट के संपर्क में आया और उनकी किस्मत बदल गई।
सरकारी नौकरी की इच्छा थी
घीसीपढ़-लिखकर सरकारी नौकरी में जाना चाहती थी। इसलिए वह अपने माता-पिता से बार-बार उसकी पढ़ाई के बारे में ही बात करती रहती थी। घीसी पढ़ाई में होशियार है। इस साल उसने बिजयनगर के प्राज्ञ कॉलेज से बीए सेकंड इयर का प्राइवेट फॉर्म भरा है।
गांव को मॉडल बनाएगी घीसी
घीसी ने दैनिक भास्कर से बातचीत में बताया कि उसके गांव में अभी मुलभूत सुविधाएं नहीं हैं। बेटियों को पढ़ाने को लेकर जागरूकता भी नहीं है। इसलिए वह अपने गांव को मॉडल गांव के रूप में डवलप करेगी। यहां सभी तरह की मुलभूत सुविधाएं डवलप करने के साथ-साथ गांव के बच्चों को पढ़ाने और उन्हें ऊंचे मुकाम तक पहुंचाने के लिए प्रयास किया जाएगा। बाकी ग्राम पंचायतों में भी इसी तर्ज पर विकास किया जाएगा। पिछड़े समाज को आगे लाने के लिए भी वे प्रय| करेंगी।