पाएं अपने शहर की ताज़ा ख़बरें और फ्री ई-पेपर

डाउनलोड करें
  • Hindi News
  • जलवायु वार्ता में हमारी बात मानी

जलवायु वार्ता में हमारी बात मानी

7 वर्ष पहले
  • कॉपी लिंक
पेरू कीराजधानी लीमा में संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन सम्मेलन में धनी और गरीब देशों के बीच लंबे समय से कायम गतिरोध आखिर टूट गया। अब नए समझौते पर सहमति बनी है, जिस पर अगले साल पेरिस में होने वाले सम्मेलन में हस्ताक्षर होंगे। भारत और अन्य विकासशील देशों की बात मानते हुए मसौदे में अतिरिक्त पैरा जोड़ा गया है कि जलवायु संबंधी कदमों का आर्थिक बोझ उठाने की क्षमता के आधार पर देशों का वर्गीकरण किया जाएगा। इसमें विभिन्न देशों की राष्ट्रीय परिस्थितियों को भी ध्यान में रखने की बात कही गई है। करीब दो सौ देशों की इस मंत्री स्तर की वार्ता के पहले भारतीय प्रतिनिधिमंडल ने जलवायु परिवर्तन संबंधी संयुक्त राष्ट्र के विशेष दूत टॉड स्टर्न से मिलकर प्रत्येक देश के ऐसे मुद्‌दों को समझने पर जोर दिया था कि जिस पर वह समझौता नहीं कर सकता। हालांकि, यह सहमति मोटेतौर पर कायम हुई है और पेरिस में ही समझौते का स्पष्ट स्वरूप सामने आएगा। अभी इस सवाल का जवाब नहीं मिला है कि जलवायु परिवर्तन की लड़ाई के लिए फाइनेंस कौन करेगा या इसके लिए निधि गठित करने की प्रक्रिया क्या होगी। अमेरिकी विदेश मंत्री जॉन केरी ने कहा कि जलवायु परिवर्तन पर समझौता अब ‘एक विकल्प नहीं, बल्कि तात्कालिक अनिवार्यता’ है, लेकिन उन्हें यह चेतावनी देने की जरूरत नहीं पड़ती, अगर इस मुद्‌दे पर संयुक्त राष्ट्र की पहले की संधि में स्वीकार किए गए सिद्धांत से अमेरिका और दूसरे धनी देश नहीं मुकरते। 1992 में संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन संधि और 1997 के क्योतो प्रोटोकॉल में सहमति बनी थी कि धरती को गर्म होने से बचाना सबका दायित्व है, लेकिन जिन देशों ने अतीत में ग्रीनहाउस गैसों का अधिक उत्सर्जन किया है, उन पर ये जिम्मेदारी अधिक आती है। इसके लिए उचित तकनीक और धन उपलब्ध कराने का जो वादा धनी देशों ने किया था, उसका जिक्र उन्होंने नहीं किया। वैज्ञानिकों के मुताबिक जलवायु परिवर्तन रोकना है, तो 2100 तक धरती के तापमान में वृद्धि को (औद्योगिक क्रांति के समय के स्तर से) 2 डिग्री सेल्सियस तक रोकना होगा। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि जो खतरा पूरी दुनिया पर मंडरा रहा है, वह सवा दो दशक से देश-समूहों के बीच कूटनीतिक दांवपेच का मुद्‌दा बना हुआ है।

संपादकीय