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यहां तालछापर से कम नहीं शाम-सवेरा, हिरणों का खूब बसेरा
अगरआप नागौर जिले से गुजर रहे हैं तो बेखौफ कुलांचे मारते हिरणों का नजारा देखकर आपको तालछापर अभयारण्य जैसे नजारे यहां रोज देखने को मिल जाएंगे। इसका बड़ा कारण विश्नोई समाज के लोगों की बहुलता तो है ही, लेकिन हिरणों वन्य जीवों से बच्चों जैसा प्यार करने की आदत उन्हें विरासत में मिली है।
काले हिरण (चिंकारा) तो यहां खूब हैं। डेगाना क्षेत्र के बुटाटी, मालों की ढाणी, राहड़ों की ढाणी, पूनास, सूर्यनगर, विष्णु नगर, राजोद, सांवलियावास, चकढाणी, बिचपुड़ी, पोलास, मालास, नेणास, हिरणी ढाणी गांव और मेड़ता क्षेत्र के डारां की ढाणी, थलां की ढाणी, रेण, बच्छवास, छापरी, लाई, लाइयों की ढाणी, जावली, दत्ताणी, डाबरियानी, जारोड़ा, खेडूली, पूंजियास आदि गांव हिरणों से भरे पड़े हैं लेकिन इनकी गणना का सही आंकड़ा आज भी वन विभाग के पास नहीं है। ‘भास्कर’ ने इन गांवों की पड़ताल की तो ग्रामीण हिरणों की संख्या लाखों में होने का दावा करते हैं।
यही नहीं, इन गांवों की सरहद में हजारों हिरण, कृष्ण मृग, नीलगाय, लोमड़ी, खरगोश, चिंकारा, मोर, वन बिलाव, गोह, पाटागोह जैसे दुर्लभ वन्य प्राणी पाए जाते हैं। डेगाना की राजोद ग्राम पंचायत में ही करीब 15000 से ज्यादा काले हिरणों का बसेरा है। कुचेरा से रेण और मेड़ता रोड से डेगाना तक रेल यात्रा करते वक्त हजारों की संख्या में उछलते-कूदते, फुदकते और कुलांचे मारते हिरणों का नजारा मन रोमांचित कर देता है। ऐसे नजारे देखते ही हर बच्चा रेलयात्री बरबस ही बोल उठता है, अरे वो देखो काले हिरण, वो रही नीलगाय, अरे ये तो चिंकारा है...!! शेषपेज | 15 पर
यूं तो हिरणों के शिकार पर पाबंदी रजवाड़ीकाल से चल रही है। विश्नोई समाज के गुरु जंभेश्वर ने सन 1451 में समाज के लिए 29 नियम बनाए थे। ये ‘बिश’ (20) और ‘नोई’ (9) ही विश्नोई समाज की स्थापना का आधार है। इन नियमों में पेड़ काटना और मांसाहार वर्जित है। विश्नोई समाज का पिछले 563 सालों से यह वन्य जीव प्रेम ही जिले में वन्य जीवों की बहुलता का कारण है। ये लोग खेतों में वन्य जीवों के लिए पानी की कुंडियां बनाते हैं। चारा और दाने पानी का इंतजाम भी करते हैं। विश्नोई समाज को पर्यावरण और का वन्य जीवों का रक्षक माना जाता है। ये लोग तो पेड़ काटते हैं ही किसी को काटने देते हैं। वन्य जीवों का शिकार करते हुए यदि कोई दिख जाए तो उसे ये छोड़ते नहीं, पकड़कर पु