पीडीपी को मर्यादा के भीतर छूट दें / पीडीपी को मर्यादा के भीतर छूट दें

Nagar News - माना जा रहा है कि जम्मू-कश्मीर की नई सरकार के पहले ग्रास में ही मक्खी पड़ गई। एक तो मुख्यमंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद का...

Mar 04, 2015, 04:00 AM IST
पीडीपी को मर्यादा के भीतर छूट दें
माना जा रहा है कि जम्मू-कश्मीर की नई सरकार के पहले ग्रास में ही मक्खी पड़ गई। एक तो मुख्यमंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद का पाकिस्तान और हुर्रियत को धन्यवाद देना और दूसरा उनके कुछ विधायकों द्वारा अफजल गुरु के शव के अवशेष मांगना- ऐसी घटनाएं हैं, जिन्हें लेकर भाजपा-पीडीपी गठबंधन पहले दिन से ही डांवाडोल होता-सा दिखाई पड़ने लगा है। लोग पूछ रहे हैं कि यह सरकार अगले छह साल कैसे चलेगी? कहीं ऐसा तो नहीं कि सत्ता के लालच में भाजपा धोखा खा जाएगी? जिस कश्मीर की खातिर भारत ने इतनी कुर्बानी दी, कहीं भाजपा उसे अनजाने ही अलगाववादियों के हाथों में तो नहीं सौंपने जा रही है? माना कि मुफ्ती खुद नरम अलगाववादी हैं, लेकिन हुर्रियत-पृष्ठभूमि वाले उनके कई विधायक क्या उन्हें मजबूर नहीं कर देंगे कि वे कश्मीर को पाकिस्तान के हवाले करने की कोशिश करें? विधायकों की यह हिम्मत कैसे पड़ी कि भारत की संसद पर हमला करने वाले अफजल गुरु के अवशेष वे मांगने लगे हैं?

मुफ्ती और उनके विधायकों के बयान पर संसद में भी हंगामा हो रहा है। सबसे ज्यादा चिल्ल-पों वे कांग्रेसी मचा रहे हैं, जिन्हें जनता ने कूड़ेदान में बिठा दिया है, लेकिन भाजपा का क्या हाल है? बोलती बंद है। आज भाजपा विपक्ष में होती तो संसद ठप हो ही जाती, देशभर में भी हंगामा मच जाता। यदि कश्मीर की सरकार में कांग्रेस की भी हिस्सेदारी होती तो देशभर में भाजपा कांग्रेस के विरुद्ध प्रदर्शन करवा देती, लेकिन भाजपा और पीडीपी का गठबंधन है। मजबूरी है, इसीलिए गृहमंत्रीजी सिर्फ इतना कह रहे हैं कि हमें मुफ्ती के बयान से कुछ लेना-देना नहीं है।

भला, यह जानें कि मुफ्ती ने कहा क्या है? मुफ्ती ने जो कुछ कहा है, उसके ‘भी’ को टीवी एंकरों ने ‘ही’ बना दिया है। इसी ही और भी के झगड़े ने सारा भ्रम पैदा कर दिया है। मुफ्ती ने कह दिया कि कश्मीर के चुनावों को सफल बनाने में पाकिस्तान और हुर्रियत का भी हाथ है। मान लिया कि यह बात अतिरंजित है या गलत है, लेकिन मुफ्ती ने फिर भी ऐसा कह दिया तो हमें सोचना चाहिए कि मुफ्ती ने ऐसा क्यों कहा होगा? इसका जवाब एकदम साफ है। ऐसा कहकर मुफ्ती दोहरे संवाद का रास्ता खोल रहे हैं। भीतरी और बाहरी संवाद! भीतरी संवाद हुर्रियत से और बाहरी संवाद पाकिस्तान से! यदि आप किसी भी संवाद के विरोधी हैं तो जरूर, मुफ्ती पर आग बरसाइए और इसी मुद्‌दे पर मांग कीजिए कि भाजपा कश्मीर की सरकार से अलग हो जाए यानी श्रीनगर की सरकार भंग हो जाए, लेकिन संयोग ऐसा है कि केंद्र में भी भाजपा सरकार है। भारत की कोई भी केंद्रीय सरकार क्या यह नहीं चाहेगी कि कश्मीर का मसला हल हो और पाकिस्तान से संबंध सहज हों? केंद्र सरकार को एक सबल मध्यस्थ अपने आप मिल गया। मुफ्ती चाहें तो भारत और पाकिस्तान के बीच सशक्त सेतु बना सकते हैं। मुफ्ती ने यह कब कहा कि कश्मीर के चुनावों को सफल बनाने में भारत के चुनाव आयोग या केंद्र और राज्य सरकार या कश्मीरी जनता का कोई योगदान नहीं है, लेकिन टीवी एंकरों को तो अपनी टीआरपी चाहिए, हर कीमत पर चाहिए। देश चैपट होता है तो हो जाए। किसी की इज्जत खाक में मिलती हो तो मिल जाए। वे पहलवानों की तरह खम ठोकने लगते हैं और किसी एक वाक्य या दो-चार शब्दों को ले उड़ते हैं। दुर्भाग्य है कि हमारे नेतागण, खासकर जब विपक्ष में हों यानी ठन-ठन गोपाल हों तो वे इन एंकरों की ही नकल पीटने लगते हैं।

मुफ्ती सईद अगर पाकिस्तान से संवाद खोलना चाहते हैं तो क्या नरेंद्र मोदी इसका उल्टा चाहते हैं? बिल्कुल नहीं। मुफ्ती से ज्यादा मोदी चाहते हैं कि पाकिस्तान से बातचीत शुरू हो, इसीलिए उन्होंने दक्षेस के बहाने विदेश सचिव जयशंकर को पाकिस्तान भेजा है। जिस हुर्रियत के बहाने हमारी सरकार ने पिछले साल अगस्त में वार्ता भंग की थी, उस हुर्रियत के बारे में पाकिस्तान की नीति तो ज्यों की त्यों है। पाक उच्चायुक्त अब्दुल बासित ने कई बार कहा है कि पाकिस्तान हुर्रियत से बराबर संपर्क बनाए रखेगा। नीति बदली है तो हमारी बदली है। हम हुर्रियत और पाकिस्तान के संबंधों के बावजूद पाक से बात कर रहे हैं। कश्मीर के चुनाव में हुर्रियत का दिखावेदार योगदान तो कहीं नहीं दिखा, लेकिन उसके कार्यकर्ताओं ने इस बार घर-घर जाकर चुनावों के बहिष्कार का नारा नहीं लगाया, इसीलिए इस बार के मतदान ने पिछले कई रिकॉर्ड तोड़ दिए। ऐसे में मुफ्ती यदि हुर्रियत को मुट्‌ठीभर श्रेय दे दें तो इसे उत्तम कूटनीति मानकर अनदेखा किया जा सकता है।

यदि आप पाकिस्तान और हुर्रियत से संवाद स्थापित करने को बिल्कुल ही गलत मानते हैं तो मैं पूछता हूं कि भारत के पास आखिर इसका विकल्प क्या है? क्या हम कश्मीर के उन लाखों लोगों को जो हमसे सहमत नहीं हैं, मौत के घाट उतार सकते हैं? अगर वे बोली से नहीं मानते तो क्या हम गोली का रास्ता अख्तियार कर सकते हैं? हमें वहां चुनाव करवाने की जरूरत ही क्या है? इसी प्रकार क्या हम परमाणु संपन्न पाकिस्तान से निपटने का सिर्फ एक ही तरीका जानते हैं, उसका नाम है- युद्ध? क्या युद्ध से भारत और पाकिस्तान का कोई भला हो सकता है? क्या उससे कश्मीर समस्या हल हो जाएगी? युद्ध करना बिल्कुल बेकार है, यह पाकिस्तान को अच्छी तरह से समझ में चुका है। मैं उम्मीद करता हूं कि भाजपा और पीडीपी का गठबंधन युद्ध का कोई बढ़िया विकल्प ढूंढ़ निकालने में बड़ी मदद करेगा।

जहां तक अफजल गुरु के अवशेष लौटाने का प्रश्न है, उस पर भी बहुत बौखलाने की जरूरत नहीं है। भयंकर से भयंकर अपराधियों के शव उनके परिजन के हवाले किए ही जाते हैं, लेकिन उस वक्त केंद्र और राज्य में दब्बू सरकारें थीं। उन्हें डर था कि अफजल का शव देखकर कश्मीर बगावत कर देगा। अब तो देश में एक जवांमर्द सरकार है और उसी की पार्टी की सरकार कश्मीर में भी है। अभी हमारी फौजें भी वहीं हैं। तो फिर डर काहे का? यदि खुफिया एजेंसी यह कहें कि अफजल के शव पर राजनीति होने वाली है तो बेशक सरकार अपनी बात पर डटी रहे, लेकिन यदि मृतक के परिजन उसके शव का अपने धार्मिक विधि-विधान से अंतिम-संस्कार करना चाहें तो उन्हें क्यों नहीं करने देना चाहिए? इससे तो यह सिद्ध होगा कि मोदी सरकार दब्बू नहीं है और वह मानव-अधिकारों और मानवीय संबंधों का सम्मान करती है। सरकार के इस निर्भीक और दो-टूक रवैए का असर अलगाववादियों पर भी पड़े बिना नहीं रहेगा। केंद्र को चाहिए कि वह पीडीपी को फिलहाल जितनी भी छूट दे सके, दे। वह हिम्मत से काम ले। बस, वह यह देखे कि संविधान की लक्ष्मण-रेखा का कहीं तनिक भी उल्लंघन हो। यदि पीडीपी से जाने-अनजाने वैसा हो जाए तो सरकार उचित कार्रवाई करने के लिए पूर्ण सक्षम है।

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मुफ्ती ने कहा क्या है? मुफ्ती ने जो कुछ कहा है, उसके ‘भी’ को टीवी एंकरों ने ‘ही’ बना दिया है। इसी ही और भी के झगड़े ने सारा भ्रम पैदा कर दिया है। मुफ्ती ने कह दिया कि कश्मीर के चुनावों को सफल बनाने में पाकिस्तान और हुर्रियत का भी हाथ है।

भारत की कोई भी केंद्रीय सरकार क्या यह नहीं चाहेगी कि कश्मीर का मसला हल हो और पाकिस्तान से संबंध सहज हों? केंद्र सरकार को एक सबल मध्यस्थ अपने आप मिल गया है।

मुफ्ती से ज्यादा मोदी चाहते हैं कि पाकिस्तान से बातचीत शुरू हो, इसीलिए उन्होंने दक्षेस के बहाने विदेश सचिव जयशंकर को पाकिस्तान भेजा है।

वेदप्रताप वैदिक

भारतीयविदेश नीति परिषद के अध्यक्ष

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