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जो स्वच्छ और सुशासित, वही स्मार्ट

7 वर्ष पहले
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प्रधानमंत्री नरेंद्रमोदी ने न्यूयॉर्क के मेडिसन स्क्वेयर पर फिर स्वच्छता का मुद्‌दा उठाया। इसके पहले स्वतंत्रता दिवस के भाषण में जब उनसे शहरी विकास को लेकर महत्वपूर्ण घोषणा की उम्मीद थी, उन्होंने स्वच्छता और लैंगिक भेदभाव जैसे विषयों पर अपना उद्‌बोधन केंद्रित रखा। दोनों बार उन्होंने उपहास के साथ यह भी कहा कि ऐसे विषयों को प्रधानमंत्री के गौर करने लायक नहीं माना जाता। स्वतंत्रता दिवस के भाषण में उल्लेख करने लायक तो कतई नहीं!

जो लोग स्मार्ट सिटी को लेकर मोदी सरकार की घोषणाओं को नया विचार मानते हैं, उन्हें लगता था कि इसका उल्लेख स्वतंत्रता दिवस जैसे महत्वपूर्ण अवसर पर किया जाना चाहिए था। हालांकि, महानगरों के अध्ययन में गहरी रुचि लेने वाले अध्येता के लिए ऐसे महत्वपूर्ण भाषणों में से ‘सिटी’ शब्द का जान-बूझकर उल्लेख करना चौंकाने वाली बात नहीं है। इसकी वजह है।

यदि भारत के आधुनिक शहरों को नकली अाधुनिकता के दयनीय प्रतीक होने से बचाकर लक्ष्य प्राप्ति के साधन होने की ऐतिहासिक भूमिका बहाल की जा सके तो यह ताजगी देने वाला विचार होगा। शहरी विकास एक उत्तेजक विचार हो गया है, क्योंकि भव्य लोक निर्माण और चमचमाती इमारतें इसके मुख्य प्रतीक हो गए हैं। हम पर दर्शनीयता का ऐसा जुनून सवार हो गया है कि हम उन्हीं चीजों को मूल्यवान समझते हैं, जो सामने दिखाई देती हैं। हमें शहरी विकास को लेकर ऐसा रुख अपनाने की आवश्यकता है, जिसमें साफ, सुव्यवस्थित कार्यक्षम शहर को सभ्यता साझा संपत्ति का लाभ सभी तक पहुंचाने का जरिया माना जाए। एक ऐसी जगह जहां नागरिक अपनी मर्जी के मुताबिक फैसले ले सकंे। स्वच्छ, सुरक्षित और उत्पादक शहर बाउंड्री वाल, फेंस, सीसीटीवी आदि में लिपटा कोई तोहफा नहीं है, जो सरकार को अपने नागरिकों को देना चाहिए।

यह तो सरकार का कर्तव्य है कि वह नागरिकों को उनका यह हक दे। साथ में उसे यह भी सुनिश्चित करना होगा कि सुव्यवस्थित गांव के हक को भी उतना ही संरक्षण मिले। प्रधानमंत्री ने 2019 तक स्वच्छ भारत निर्मित करने का लक्ष्य रखा है, जो जन-भागीदारी से ही हासिल किया जा सकता है। उन्होंने हर स्कूल में टॉयलेट मुहैया कराने की बात की, मैन्यूफैक्चरिंग में नौकरियां बढ़ाने की बात की, आयात पर निर्भरता घटाने की बात की यानी बिना शब्द उच्चारे उन्होंने स्वदेशी की बात की, जिनमें ‘डिफैक्ट’ (पर्यावरण संबंधी) ह