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दिल वालों की दिल्ली नसीब वालों की नहीं

6 वर्ष पहले
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इस हार में भाजपा को नरेंद्र मोदी का चेहरा नजर आए आए, पर इस जीत में दिल्ली को केजरीवाल का चेहरा साफ- साफ नजर रहा है। कांग्रेस उससे भी नीचे उतर गई जहां से चली थी। भाजपा की करारी हार में नकारात्मक प्रचार शैली तो जिम्मेदार है ही, ज्यादा जिम्मेदार है पार्टी की पल-पल बदलती रणनीति। भाजपा माने माने पर यह सच है कि मोदी ने जिस दिन ‘नसीबवाला और बिना नसीबवाला’ का जुमला उछाला उसी दिन दिल्ली ने मन बना लिया था। कैसे कोई प्रधानमंत्री खुद के नसीब से देश चलने की बात कर सकता है?

चुनाव प्रचार में भाजपा ने ‘अाप’ और केजरीवाल को निशाने पर लेकर रणनीतिक भूल कर दी, इसकी वजह से हारती कांग्रेस का वोट बैंक ‘आप’ की तरफ खिसक गया। भाजपा ने ही कांग्रेस को हाशिये पर रखकर उसके वोट बैंक को ‘आप’ की तरफ धकेलने का काम किया, यह अंतिम समय तक पार्टी की समझ में नहीं आया। अब सवाल यह नहीं है कि भाजपा की इस हार का जिम्मेदार कौन है। यह सबको पता है? पार्टी ने जिस किरण बेदी को दिल्ली का चेहरा बनाकर कृष्णा नगर से मैदान में उतारा, वहां से वे परास्त हो गईं। ट्विटर पर दौड़ रहा यह जुमला सटीक है कि कांग्रेस इस बात से खुश है कि भाजपा साफ हो गई और भाजपा कार्यकर्ता इस बात पर जश्न मना रहे हैं कि किरण बेदी हार गईं।

नतीजों ने देश में लोकतंत्र को मजबूती देने का काम किया है। कांग्रेस को शून्य पर लाकर, भाजपा के अहंकार को तोड़कर और केजरीवाल को सबकुछ देकर कि चलो अब निभाओ लोक-लुभावन वादे, करो दिल्ली को भ्रष्टाचार मुक्त? मतदाताओं ने बहाने बनाने की गुंजाइश नहीं छोड़ी है। केजरीवाल ने इसे साकार नहीं किया तो शायद अगले चुनाव में वे भी इतिहास बन जाएं। कल तक सोशल मीडिया में छाए रहने वाले मोदी आज निशाने पर हैं। मैसेज बता रहे हैं कि अब भाषणों, फतवों, चालों, अहंकार और ओबामाओं से चुनाव नहीं जीते जाते।

(लेखकदैनिक भास्कर के नेशनल सैटेलाइट एडिटर हैं।)

ओम गौड़