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एक डरावनी जीत, एक डरावनी हार और एक निडर संदेश
इधर मोबाइलफोन की स्क्रीन पर अलर्ट आया और उधर हरियाणा के जींद इलाके की एक अलर्ट दादी अंजू ने अपने कोमल से पोते का फोटो फेसबुक पर डाला। अलर्ट अरविन्द केजरीवाल की जीत की ‘साइज’ पर था, जो कोई सोच भी नहीं सकता था। फोटो में पोता केजरीवाल जैसे मफलर लपेटे था! वही मफलर जो कभी मखौल बना दिया गया था। आज उसका ऐसा माहौल था। इतना उत्साह था लोगों में। अंजू का परिवार दिल्ली से है। दिल्ली के लाखों परिवार केजरीवाल पर ऐसा ही भरोसा कर रहे हैं। अपने बच्चों में केजरीवाल देख रहे हैं! कम से कम सोशल मीडिया के ट्रेंड तो यही बता रहे हैं। इनमें अधिकांश परिवार वे हैं, जिन्होंने देश के लिए मोदी को वोट दिया था।
सारे सर्वेक्षण ध्वस्त। सारे विश्लेषण विफल।
टीवी पर वो तेज़ी से घटते-बढ़ते परिणामों का चार्ट कहीं नहीं था। सिर्फ बढ़ी, बढ़ी और बढ़ती जो गई आम आदमी पार्टी की सीटें। बाकी सब शून्य में ताक रहे थे। हालात यह थी कि िजन टीवी चैनल्स पर चुनाव नतीजों की शाम आठ-आठ लोग दहाड़ते हुए लड़ते हैं, उनके पास बात करने के लिए कुछ था ही नहीं। वहां कवि सम्मेलन जैसा माहौल था।
किन्तु यह सब काफी डरावना है। स्वयं केजरीवाल ने जो ऐतिहासिक जीत के बाद मन की बात कही है - वह एकदम सही है। कि यह डराने वाला बहुमत है। यह उन्हें इतनी शक्ति दे देगा कि उसका उपयोग सही या ग़लत हो रहा है - यह देखना अनिवार्य हो जाएगा। यह जीत उन्हें इतनी स्वतंत्रता दे देगी कि वे हर निर्णय बिना किसी बाहरी समर्थन के स्वविवेक से ले सकेंगे। चूंकि केजरीवाल भी राजनीति के अब मंजे-तपे ज्ञाता बन चुके हैं। - तो वे निश्चित कुछ कुछ लगातार करते रहेंगे। वे काम करने की ऊर्जा भी रखते हैं और बड़ा काम करने की छटपटाहट भी। ऐसे में वे निरंतर कुछ ऐसा करते रहेंगे कि उन्हें भरपूर मीडिया अटेन्शन मिले। वे शुरू से खु़द को नरेंद्र मोदी के समकक्ष खड़ा करने के लिए तैयार और उनसे लड़ने के लिए तत्पर रहते रहे हैं। ऐसे में यदि वे छोटे-छोटे स्थानीय मुद्दों, नागरिक समस्याओं में से कोई बड़ा आइडिया सामने लाने में सफल हो गए - तो राष्ट्रीय स्तर पर चुनौती बन सकते हैं। जैसे कि गुजरात डेवलपमेंट मॉडल का कोई व्यावहारिक तोड़ या कि उसका ज़ोरदार जोड़ ले आएं, तो वो जो बिखरा, निष्प्राण विपक्ष है - उसमें प्राण सकते हैं।
लोकसभा चुनाव के बाद से ही मीडिया में मोदी ही मोदी हैं। सफलताएं ही इतनी हैं। ऐसे में केजरीवाल यदि अपनी महाविजय के पहाड़ पर जनहित का कोई ऐसा झण्डा गाड़ पाते हैं जिसे दिल्ली ही नहीं समूचा देश फहराना चाहे -तो वे मोदी के बराबर खड़े ही हो पाए- तो भी बैठ ज़रूर जाएंगे। क्योंकि वे ऐसे ही हैं। चूंकि प्रधानमंत्री, और वह भी लार्जर-देन-लाइफ नरेंद्र मोदी से एक मुख्यमंत्री की - वह भी धरने-प्रदर्शन-को तत्पर अरविन्द केजरीवाल की यूं कोई तुलना तार्किक नहीं है -इसलिए क्या आगे होगा- काफी अर्थपूर्ण भी हो सकता है और अराजक भी।
जैसे कि दिल्ली में पुलिस केंद्र सरकार के मातहत काम करती है। मुख्यमंत्री को रिपोर्ट नहीं करती। ग़लत पुलिस वालों को ठीक करने में केजरीवाल की छवि जगजाहिर है। तो एक मुद्दा, एक मोर्चा तो यही खुलेगा। केंद्र से टकराहट का। काफी जोश-ओ-ख़रोश भरा, घटना-प्रधान माहौल आने वाला है दिल्ली का।
सब कुछ केजरीवाल के काम पर निर्भर करता है।
इसी तरह यह एक डरावनी हार है। किरण बेदी ने इसे खुद की नहीं, भाजपा की हार कहा है। उनकी यही सोच है। इससे स्पष्ट है वे जिम्मेदारी से बचती हैं। िदल्ली के सजग, सतर्क नागरिक यह पहले ही समझ गए थे। उन्हें बेदी को ऐसे पैराशूट से मुख्यमंत्री के रूप में ऊपर से उतरना कतई पसंद नहीं आया। भाजपा को डरावनी हार के मूल में लगातार सफलता का दंभ था। पार्टी को यह भ्रम हो गया था कि अब एक सफलता के कारण अन्य सफलताएं अपने आप मिलती जाएंगी। वह स्वयं सुशासन की बात कर देश का चुनाव जीती है - किन्तु इस बात को अनदेखा कर रही थी कि आम आदमी पार्टी की 49 दिन की सरकार में हर ज़रूरतमंद दिल्लीवासी उस अपमानजनक भ्रष्टाचार से निज़ात पा गया था जो पुलिस वाले, नाके वाले, इंस्पैक्टर राज वाले ‘हफ्ता वसूली’ के रूप में करते थे। छोटे कारोबारी, रिक्शा चालक, बिजली के बढ़े और बढ़ाए गए बिलों से त्रस्त परिवार के परिवार उस 49 दिनों में खुश थे।
वोटरों काे यह भी पसंद नहीं आया कि भाजपा ने दिल्ली चुनाव भी मोदी के माध्यम से लड़ा। क्यों? इतनी बड़ी पार्टी है। सिर्फ मोदी के नाम पर ही क्यों जीतना चाहती है? लोग चाहते हैं कि मोदी को तो प्रधानमंत्री के तौर पर केंद्र सरकार और देश चलाना चाहिए। चुनाव पार्टी लड़े। अभी बिहार की बड़ी-भारी लड़ाई है। उस पर इस हार का डर भारी पड़ सकता है। चारों ओर से िबखरे विपक्ष को एकजुट होने का सहारा मिल सकता है। इसकी आंच उत्तरप्रदेश तक जाएगी। एक हार, अनेक संदेह।
मोदी ने एक नया नारा देते हुए कहा था कि दिल्ली की जनता उसे चुने जो ‘मुझसे डरे, और डरकर काम करे।’ दिल्लीवासियों ने निडरता का संदेश देकर सभी को डरा दिया है।