क्या चल रहा है कश्मीर में
कश्मीरियोंकोलगता है कि अगर वे लोकतंत्र में भरोसा जाहिर करेंगे तो उनकी तरफ देखा जाएगा। उनका आने वाला कल बेहतर होगा। इसी भरोसे पर उन्होंने मतदान के तीन चरणों में पिछले रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं। दो दशक तक आतंकवाद की चपेट में रहे इस खूबसूरत राज्य के वोटर अब ऐसी सरकार चाहते हैं, जो दहशत के खेल का खात्मा करे।
मगर चुनावी हवा को सबसे ज्यादा बदलने में कारगर भूमिका निभाई यहां के नौजवानों ने। यहां बेरोजगार युवाओं की तादाद करीब 15 लाख बताई जाती है, जिनमें से छह लाख सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज हैं। कश्मीर की बदहाली के सबसे बड़े शिकार यही हैं। गाेंदीपोरा की फिजा कॉलेज में पढ़ती हंै। वह चाहती हैं कि घाटी की लड़कियां ऊंची तालीम हासिल करें। बेखौफ होकर अपने पैरों पर खड़ी हों। उन पर पाबंदियां हों। वे कहती हैं, दहशतगर्दों को सबक सिखाने का यही सही मौका था। सितंबर में बाढ़ की तबाही से निपटने में बुरी तरह नाकाम उमर अब्दुल्ला सरकार से चौतरफा नाराजगी की ताजा वजह है। यह चुनाव सिर्फ िरकॉर्ड तोड़ वोटिंग के लिहाज से ही अहम नहीं हैं। कुछ नए नजारे भी हैं। जम्मू-कश्मीर पीपुल्स कॉन्फ्रेंस 1987 के बाद पहली बार विधानसभा चुनाव में उतरी है। इसके प्रमुख सज्जाद लोन की पिछले दिनों प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात चर्चाओं में रही। खासकर तब जब लोन ने मोदी की तारीफों के जमकर पुल बांधे। उन्होंने कहा कि माेदी जमीन से जुड़े नेता हैं और उनके पास गजब का विजन है। हालांकि घाटी में दूसरे संगठनों में भाजपा से घबराहट एकदम साफ है।