कश्मीर को चाहिए इंसानियत
अपने अंतकी ओर बढ़ रहा 2014 कमल का वर्ष रहा है। अथक परिश्रम के धनी नरेंद्र मोदी-अमित शाह की जोड़ी ने भाजपा को केंद्र में अद्भुत जीत दिलाई, महाराष्ट्र और हरियाणा के चुनाव जीते और झारखंड में भी जीत की दहलीज पर पहुंच गए हैं। जब आप बनिहाल दर्रा पार करके डल झील के किनारे पहुंचते हैं तब लगता है कि कमल कुछ मुरझा गया है। भाजपा ने चाहे जम्मू-कश्मीर में ‘मिशन 44’ के लिए जोर लगाया हो, लेकिन यह अपेक्षा अतिशयोक्ति ही कही जाएगी।
और इसके बावजूद अनजाने क्षेत्र में भाजपा ने जैसा चुनाव लड़ा है वह इसके नेतृत्व की प्रबल महत्वाकांक्षा की ही पुष्टि करता है। पार्टी ने कश्मीर घाटी में कभी एक सीट भी नहीं जीती है। राज्य के चुनाव में इसका सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन 2008 में रहा था जब अमरनाथ भूमि विवाद की लहर पर सवार होकर इसने जम्मू क्षेत्र में 11 सीटें जीती थीं। इस पर जम्मू-उधमपुर पट्टे का हिंदू दल होने की छाप है। अब भाजपा राज्य के चुनावी परिदृश्य में खुद को भी गिनने लगी है, जो शाह के सार्वजनिक रूप से व्यक्त इस सपने का प्रतििबंब है कि केसरिया पार्टी ‘कश्मीर से कन्याकुमारी’ तक सत्ता में रही है।
बेशक, भाजपा के पास घाटी में कुछ विश्वसनीय प्रत्याशी हैं, जिसमें पहली बार 32 स्थानीय मुस्लिम भी शामिल हैं। इस सूची में डेंटिस्ट, ब्यूरोक्रेट और समर्पण कर चुके आतंकी हैं, जबकि सेवानिवृत्त पुलिस अधिकारियों की सेवाएं रणनीति बनाने में ली गई हंै। पार्टी ने सारे संसाधन झोंक दिए हैं। भाजपा के पोस्टर और रेडियो विज्ञापन लोगों का ध्यान खींचने में प्रदेश के दलों से होड़ कर रहे हैं। राम माधव जैसे वरिष्ठ नेताओं ने चुनाव अभियान में काफी वक्त दिया है। अभिनेता अनुपम खेर जैसे पार्टी से सहानुभूति रखने वाले लोगों ने मतदाताओं को रिझाने का प्रयास किया और प्रधानमंत्री ने श्रीनगर में प्रभावी रैली को संबोधित किया। इसके बावजूद घाटी से लौटने के बाद ऐसा क्यों नहीं लगता कि भाजपा कश्मीर में कोई पैठ जमा पाएगी?
एक स्तर पर ऐसा इसलिए है कि भाजपा इतिहास से लड़ रही है। दूसरी तरफ पार्टी लगभग खुद से लड़ रही है। कश्मीर में भाजपा और इसके पूर्व अवतार जनसंघ का इतिहास इस विश्वास के आस-पास बना है कि घाटी को विशेष दर्जे का हक नहीं है, अनुच्छेद 370 पृथकतावाद को बढ़ावा देता है और कश्मीरी पहचान को भारतीय राष्ट्रीयता में शामिल होना चाहिए। संघ परिवार के व