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जो हमारी मुंतजिर रहती थीं, वो आंखें बुझ गईं

5 वर्ष पहले
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गजल...यानीमहबूब की तारीफ। लेकिन मुन्नवर राणा ने यह मायने बदले, सलीका तोड़ा और अपने हर कलाम में बताया कि कैसे कोई मां से मोहब्बत को शायरी की बुलंदी तक ले जा सकता है। मां पर लिखे हर कलाम में यह कमाल करने वाले प्रख्यात शायर मुन्नवर राणा की मां आयशा खातून का इंतकाल हो गया। वे 85 साल की थीं। बकौल राणा- अबअंधेरा मुस्तजिर रहता है हर दहलीज पर, जो हमारी मुंतजिर रहती थीं, वो आंखें बुझ गईं। शायदराणा ने सोचा होगा उनकी गजलों में सजे अशरार हकीकत में यूं बदल जाएंगे।

राना का मां से अपने अटूट जज्बातों का सिलसिला लंबी बीमारी के बाद मंगलवार को थम गया। उनकी मां आयशा ने लखनऊ के एक हॉस्पिटल में अंतिम सांस ली। मुनव्वर ने जितनी भी गजलें वह शायरी लिखी हैं, उनमें मां अलिफ की तरह पहले ही आती है। मां की अकीदत और मोहब्बत उनका विषय भी रहा है और विशेषता भी। वे कहते हैं ‘लिपट जाता हूं मां से और मौसी मुस्कुराती है, मैं उर्दू में ग़ज़ल कहता हूं, हिन्दी मुस्कुराती है।’ हर महफिल में मां को याद किया और इसकी वजहें भी बताई। मां से उनके जज्बातों की एक बानगी- मुन्नवरमां के आगे यूं खुलकर नहीं रोना, जहां बुनियाद हो वहां इतनी नमी अच्छी नहीं होती।

एकसाहित्यकार ने कहा था कि ‘मुनव्वर ने मां को बुलंदियों पर पहुंचाकर साक्षात पयंबर का दर्जा दिया है।’ कुछ समय पहले राणा से पूछ गया कि शायरी का प्रमुख विषय मां क्यों बनाया? तो जवाब था- ‘मैं दुनिया के सबसे मुकद्दस और अज़ीम रिश्ते का प्रचार सिर्फ इसलिए करता हूं कि अगर मेरे शेर पढ़ कर कोई भी बेटा मां की खिदमत और ख्याल करने लगे, रिश्तों का एहतराम करने लगे तो शायद इसके बदले में मेरे कुछ गुनाहों का बोझ हल्का हो जाए। शेष| पेज 4





मांसे इस प्रेम की झलक इस शायरी में नजर आती है...

किसीको घर मिला हिस्से में या दुकां आई, मैं घर में सबसे छोटा था मेरे हिस्से में मां आई।

इस तरह मेरे गुनाहों को वो धो देती है, मां बहुत ग़ुस्से में होती है तो रो देती है।

लबों पे उसके कभी बददुआ नहीं होती, बस एक मां है जो मुझसे ख़फ़ा नहीं होती।

राणाने मां सिर्फ शायरी नहीं कि, मां फाउंडेशन भी बनाया है। मां पर लिखी शायरी से हाेने वाली सारी आमदनी वे जरुरतमंदों पर खर्च करते हैं। वे कहते हैं कि

मेरीख्वाहिश है कि मैं फिर से फरिश्ता हो जाऊं, मां से इस तरह लिपट जाऊं कि बच्चा हो जाऊं।

घेर लेने को मुझे जब भी बलाएं गईं, ढाल बनकर सामने मां की दुआएं गईं।

राणाके पारिवारिक सूत्रों के मुताबिक बताया कि आयशा खातून को बुधवार सुबह मुनव्वर के गृह नगर रायबरेली में सुपुर्दे खाक किया जाएगा। लेकिन राणा के ही शब्दों में ही-

जबतक रहा हूं धूप में चादर बना रहा

मैं अपनी मां का आखिरी जेवर बना रहा।

मां आयशा खातून के साथ मुनव्वर राणा

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