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संवेदनशीलता ही सरकारी विभागों का रक्षा कवच है

4 वर्ष पहले
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स्टोरी 1 : रांचीसे 300 किलोमीटर दूर रोहतास में न्यू सिंघाउली गांव में 65 साल के राजू सेठ अंडे बेचते हैं। पूूरी जिंदगी रोजमर्रा की जरूरतों को पूरा करने के लिए उन्होंने कड़ी मेहनत की। 28 दिसंबर 2015 को उन्हें एक दुर्घटना के मामले में गैर-जमानती वारंट पर गिरफ्तार कर लिया गया। दुर्घटना में दो लोगों की मौत हो गई थी और कई घायल हुए थे। वे पुलिस से पूछते रहे कि मेरा अपराध क्या है और पुलिस उनसे कहती रही कि तुम्हें पता है। कोर्ट ने 11 जनवरी 2016 को उसे रिहा कर दिया। रिहा होते ही सेठ ने यह जानने की कोशिश की कि रांची की डालमीनगर पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार क्यों किया था और जेल क्यों भेजा। उन्हें आश्चर्य हुआ कि उन्हें एक दुर्घटना के आरोप में पकड़ा गया था, जो किसी राजू गुप्ता नाम के व्यक्ति ने की थी। इत्तेफाक से राजू गुप्ता उसी इलाके में रहता था, जहां राजू सेठ रहते थे। कोर्ट ने 11 नवंबर को गुप्ता के खिलाफ गैर-जमानती वारंट जारी किया था, क्योंकि कई बार याद दिलाने के बाद भी वह हाजिर नहीं हो रहा था। गुप्ता के कोर्ट में हाजिर होने का कारण यह था कि 14 अप्रैल 2015 को महाराष्ट्र के औरंगाबाद में एक सड़क दुर्घटना में उसकी मौत हो गई थी। 36 साल का गुप्ता 18 नवंबर 2014 को आखिरी बार कोर्ट में हाजिर हुआ था। उसके परिवार के सदस्यों ने उसका मृत्यु प्रमाण-पत्र कोर्ट में पेश कर दिया था, जिसे नजरअंदाज कर दिया गया और उसकी गिरफ्तारी का गैर-जमानती वारंट कोर्ट ने जारी कर दिया।

कोई नहीं जानता कि पुलिस ने सेठ को क्यों पकड़ा और उन्हें गुप्ता के रूप में क्यों पेश किया। उन्हें अपराध स्वीकार करने के लिए प्रताड़ित किया गया। हालांकि अब सेठ ने पड़ोसियों से वित्तीय मदद लेकर स्थानीय कोर्ट में न्याय के लिए याचिका दायर की है। इस साल 18 जुलाई को प्रथम श्रेणी ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट मनीष कुमार जायसवाल ने डालमीनगर पुलिस स्टेशन के हाउस ऑफिसर को शोकाज नोटिस जारी कर विस्तृत रिपोर्ट मांगी है। राजू गुप्ता के भाई कृष्णा गुप्ता को पता था कि पुलिस ने गलत व्यक्ति को गिरफ्तार कर लिया है, जिसका इस मामले से कोई लेना-देना नहीं है। उसका दावा है कि उसने सभी जरूरी दस्तावेज, जिसमें मृत्यु का प्रमाण-पत्र भी था, कोर्ट को सौंप दिया था। सेठ के लिए अपनी गरीबी और जेल मेें बिताए दो सप्ताह के समय से ज्यादा कष्टदायक अपने नाम पर लगे दाग काे साफ करना हो गया है।

स्टोरी2 : इसबुधवार तक कोई भी महेश सुराणा को प्रॉपर्टी टैक्स विभाग की सीढ़िया उतरते-चढ़ते देख सकता था। यह पुणे म्यूनिसिपल कॉर्पोरेशन का सबसे अधिक राजस्व पाने वाला विभाग है। महेश का रवैया इतना सहयोगात्मक है कि सभी 8.3 लाख प्रॉपर्टी मालिक जब ऑफिस में आते हैं तो हमेशा महेश को ही तलाशते हैं। उनकी पहुंच हर कंप्यूटर, हर अलमारी, हर फाइल और दफ्तर के हर कोने तक है। इसके बावजूद कि उनका दफ्तर में एक निर्धारित स्थान है। वे कस्टमर्स के लिए हर काम मैनेज करते हैं, निश्चित रूप से घूस के लिए!

जब उसका नाम बहुत हो गया तो एक जांच बैठी। पता चला कि वह तो कर्मचारी है ही नहीं, जबकि सभी लोग समझते थे कि वह उनके बीच का ही कर्मचारी है। इसके बावजूद कि कॉर्पोरेशन ने सभी कर्मचारियों को आईडी दिए हैं और बहुत पहले ही अनिवार्य रूप से उपस्थिति दर्ज करने की बायोमैट्रिक व्यवस्था लागू हो चुकी है। इस गुरुवार को पुणे के सिविक चीफ कुणाल कुमार ने उसके खिलाफ एक पुलिस शिकायत दर्ज करने और विशेष जांच का आदेश दिया है। इसका परिणाम जो भी हो, महेश ने पूरे विभाग की संवेदनहीनता का लाभ उठाया और अपने लिए पैसा कमाया और कथित रूप से दूसरों के लिए भी।

फंडा यह है कि किसीभी सेक्टर में कंज्यूमर टच पॉइंट ग्राहक की के प्रति बहुत संवेदनशील होना चाहिए वरना बदनामी की अाशंका रहेगी।

एन. रघुरामन

मैनेजमेंटगुरु

raghu@dbcorp.in



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