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इंटरनेट पर सबके समान अधिकार की जीत

5 वर्ष पहले
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भारत में इंटरनेट के करोड़ों यूज़र इस खबर से राहत महसूस करेंगे। यह इंटरनेट माध्यम की तटस्थता यानी- नेट न्यूट्रेलिटी- के पक्षधरों के लंबे संघर्ष का परिणाम है। टेलीकॉम रेगुलेटरी ऑथरिटी ऑफ इंडिया (ट्राई) ने इंटरनेट सेवा शुल्क में भेदभाव पर प्रतिबंध लगा दिया है। इसका उल्लंघन करने वालों पर जुर्माने का प्रावधान भी उसने किया है। इसके बाद अब फेसबुक की फ्री बेसिक्स तथा एयरटेल जीरो जैसे स्कीम नहीं चलाई जा सकेंगी। फेसबुक ने अपनी योजना के पक्ष में सैकड़ों करोड़ रुपए का धुआंधार विज्ञापन अभियान चलाया। ऐसी धनाढ्य कंपनियों के सामने नेट न्यूट्रेलिटी के साधनहीन समर्थक थे। मगर ट्राई को ई-मेल भेजने और इस विनियामक संस्था के सामने अपना पक्ष रखने की उन्होंने निरंतर मुहिम चलाई। अंततः तर्क और व्यापक जनहित की विजय हुई। अब ट्राई का फैसला है कि कोई सेवा प्रदाता कन्टेंट के आधार पर डेटा सेवाओं के शुल्क में भेदभाव नहीं करेगा। वह किसी व्यक्ति से ऐसा कोई करार या व्यवस्था नहीं करेगा, जिससे डेटा सेवाओं की दर में भेदभाव रोकने के उपरोक्त आदेश का उल्लंघन हो। ट्राई ने आपात स्थिति में इमरजेंसी सेवाओं को कम दर पर मुहैया कराने की इजाजत दी है, लेकिन आम हालत में ऐसा करने पर सेवा प्रदाता पर प्रति दिन 50 हजार रुपए का दंड लगाने का प्रावधान किया है। कहा जा सकता है कि अंततः भारत में इस समझ को मान्यता मिली है कि आज के दौर में इंटरनेट पानी या बिजली जैसी आवश्यक सेवा है, जिसे समान रूप से तथा समान दर पर पाने का हर नागरिक को हक है। नेट न्यूट्रेलिटी का विवाद सबसे पहले अमेरिका में उठा, जब बड़ी कंपनियों ने अपनी वेबसाइटों तक पहुंच की रफ्तार तेज करने के लिए इंटरनेट सेवा प्रदाताओं से करार किया। मगर सिविल सोसायटी के जोरदार विरोध के बाद राष्ट्रपति बराक ओबामा ने एेलान किया कि उनका प्रशासन इस माध्यम पर ऐसा भेदभाव नहीं होने देगा। यूरोप के कई देशों में अभी तक नेट न्यूट्रेलिटी के पक्ष और विपक्ष में बहस जारी है। इस बीच ट्राई ने दो-टूक फैसला देकर भारत में इस बारे में सभी भ्रमों को खत्म कर दिया है। यह इस बात की पुनर्पुष्टि है कि इंटरनेट पर सबका बराबर हक है। अपेक्षा थी कि केंद्र सरकार इस बात को बेलाग-लपेट के कहती। मगर वह असमंजस में रही। बहरहाल, अब उसका दायित्व है कि ट्राई के फैसले पर प्रभावी अमल को सुनिश्चित कराने में अपना योगदान दे।

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