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शाही नहीं अब सामूहिक शादियां लगी है लोगों को भाने
आमऔर खास की मौजूदगी.......कम खर्च और परिवारों को परेशानी से बचाने का नायाब तरीका....। शाही शादियों की धूम के बीच जिले में अब सामूहिक शादियां लोगों को अधिक भाने लगी है। यही कारण है कि 14 साल में सामूहिक विवाह सम्मेलन के आयोजन में चार गुना बढ़ोतरी हुई है। हिंदू मुस्लिम और इन धर्म समुदायों की उप जातियों के लोगों में सामूहिक शादियों का क्रेज इतना बढ़ा है कि सामूहिक सम्मेलन में राजकीय अनुदान पाने वालों की कतार लग रही है।
नागौर जिले में इस बार होने वाले सामूहिक विवाह सम्मेलन में राजकीय अनुदान के लिए 428 जोड़े कतार में हैं। महिला अधिकारिता विभाग के आंकड़े बताते हैं कि जिले में नई शताब्दी की शुरुआत में वर्ष 2000 में जहां पूरे वर्ष में एक या दो समाज के लोग सामूहिक विवाह सम्मेलन में रूचि दिखा रहे थे वहीं अब कई समाज के लोग ऐसे आयोजन में आगे आए हैं। पिछले साल ही अलग अलग समाज की छह संस्थाओं ने करीब 18 लाख रुपए का अनुदान सामूहिक विवाह सम्मेलन का आयोजन करने पर सरकार से लिया है। इसमें कुमावत विकास समिति के 31 जोड़ों के सम्मेलन पर 3.87 लाख, कुमावत समाज सुधार सेवा संस्थान के 41 जोड़ों के सम्मेलन पर 2.75 लाख, माली सैनी समाज परबतसर में 23 जोड़ों के सम्मेलन में 1.38 लाख, नागौर के मुल्तानी आहनगरान सोसायटी के 38 जोड़ों के सम्मेलन पर 4.75 लाख, मेघवाल समाज सेवा संस्थान मकराना के 32 जोड़ों के सम्मेलन पर 5.12 लाख का अनुदान बांटा जा चुका है। शेषपेज 17 पर
मिट रही हैं कुरीतियां, दिखने लगी सरलता
आमतौर पर ग्रामीण शहरी इलाकों में होने वाले शादियों में जहां कई कुरीतियां और परंपराएं ऐसी देखी जाती हैं जो गरीब परिवारों के लिए परेशानी और फिजूल खर्चे वाली होती हैं। अब सामूहिक सम्मेलन में ऐसी कुरीतियों से गरीब मध्यम वर्ग के परिवारों को निजात मिल रही है। सामूहिक सम्मेलन में दुल्हा दुल्हन को शादी के जोड़े में लाना और सात फेरों या निकाह की रस्म के बाद घर ले जाना इस दौरान जनप्रतिनिधियों, मौजीज लोगों की उपस्थिति भी लोगों को काफी भा रही है। जिन गरीब परिवारों को अपने घर पर शादी ब्याह के दौरान किसी बड़े नेता या अफसर को बुलाना महज सपना होता था वहीं अब ऐसे आयोजन और उनके बेटे बेटियों की शादी में नेता आैर अफसर सब शामिल हो रहे हैं।
^यह सही है कि सामूहिक सम्मेलन का आयोजन हर समाज के लोगों के लिए फायदेमंद है