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हिंदी साहित्य परिषद ने बसंतोत्सव मनाया

5 वर्ष पहले
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हिंदीसाहित्य परिषद की ओर से आयोजित बसंतोत्सव काव्य गोष्ठी के साथ संपन्न हुआ। उत्सव में सबसे पहले पंडित कैलाश शर्मा ने मां सरस्वती की पूजा अर्चना कराई। सरस्वती वंदना के बाद बसंत के स्वागत में काव्यपाठ किया। युवा संजय मेहरा ने भारत के सपूत हनुमंथप्पा और अन्य शहीदों के प्रति श्रद्धा प्रकट करते हुए हम देशवासी तुम पर स्वाभिमान करते है अमर जवानों का श्रद्धा सम्मान करते है। मेहरा ने राष्ट्र समर्पण का कौमी एकता की भावना से ओत-प्रोत एक कविता सुनाई। शिव कुमार शर्मा ने ऐसी मधुमासी रतियन में, प्रियमत मुझसे आंख चुराओ कविता पेश कर शृंगार रस बिखेरा। डॉ. भारतभूषण शर्मा ने ये जिंदगी एक रंगमंच है। जहां हर इंसान नाटक करता है। माचिस की जरूरत नहीं आदमी से आदमी जलता है कविता सुना वास्तविकता से रूबरू कराया। गोष्ठी में एक बालक मक्खन ने नृत्य के साथ बालमन की कविता पेश की और सभी का मन मोहा। शायर बेकस अजमेरी ने सनम तुमको भुलाऊं तो भुलाऊं कैसे, दिल के आईने में तस्वीर उतर आई है सुनाकर खूब तालियां बटोरी। शर्मा ने जब शरद ऋतु का चांद मंद पड़ जाए जब मुझे बुलाना मैं बसंत बन कर आऊंगा कविता सुनाई। कवि सर्वेश गार्गिया ने किसने किया, शृंगार प्रकृति का कोई तो बताओ, मुख्य अतिथि पंडित कैलाश शर्मा ने आया बसंत आया बसंत सब जग पर छाया बसंत चिर परिचित कविता सुनाई। परिषद अध्यक्ष प्रवीण चंद गदिया ने बसंत पंचमी पर विचार व्यक्त किए। परिषद के बंशीलाल कुमावत, संदीप तिवारी आदि ने गोष्ठी की व्यवस्थाएं संभाली।

नसीराबाद. काव्य गोष्ठी में काव्य पाठ करते कविगण।

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