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राय की किताब ने उठाए नए सवाल

7 वर्ष पहले
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पूर्व नियंत्रकएवं महालेखापरीक्षक (कैग) विनोद राय की ताजा किताब नॉट जस्ट एन अकांटेंट : डायरी ऑफ नेशन्स कॉन्शन्स कीपर’ ने जारी होने के पहले ही खासी दिलचस्पी जगाने के साथ तीखी बहस भी छेड़ दी है। किताब की सामग्री का काफी प्रचार हो चुका है। उस पर बहस और टिप्पणियां की जा चुकी हैं। कुछ हलकों से उसका जोरदार समर्थन हुआ है, तो तीखा विरोध भी देखा गया है। पहली नजर में ऐसा लगता है कि इसमें नया कुछ नहीं कहा गया है। उनमें उन्हीं बातों की पुष्टि की गई है जो कैग रिपोर्ट, न्यायालयीन कार्यवाही और अखबारों की ‘खोजी रिपोर्टों’ सहित विभिन्न हलकों से सुनी गई हैं, क्योंकि 2-जी प्रकरण मुकदमे के चरण में पहुंच चुका है, कलमाड़ी का मामला अदालत में है और सर्वोच्च न्यायालय ने कोयला खदानों के 1993 से 2012 तक के आवंटन को अवैध घोषित कर दिया है। हम यह भी जानते हैं कि यूपीए सरकार पर ‘दोहरा’ नियंत्रण था।

प्रधानमंत्री निष्प्रभावी डमी या कठपुतली थे और पिछले दस वर्षों के कुशासन की सारी त्रासदियों को ‘गठबंधन धर्म’ के नाम कर दिया गया है। राय की किताब विश्वसनीय है और उन सारी चीजों की पुष्टि करती है, जिनका हमें अनुमान था या जो हमारी जानकारी में थीं, लेकिन क्या कहानी यहीं खत्म हो जाती है? स्पष्ट है कि पहले के सारे प्रश्नों के निर्णायक जवाब देने के साथ किताब ने कुछ नए प्रश्न भी खड़े किए हैं।

इतने वर्षों में राष्ट्रमंडल, कोयला, 2-जी घोटाले उजागर होने के साथ हुई घटनाओं पर हम गौर करते रहे हैं। यह किताब परोक्ष रूप से ही सही यह बताती है कि ये सारे असंबद्ध घोटाले नहीं थे, इन्हें जोड़ने वाला एक समान सूत्र भी था। जैसी कि अंग्रेजी की कहावत है, सारी सड़कें रोम जाती हैं। इन सब घटनाओं की प्रधानमंत्री को जानकारी थी। ओढ़ी हुई चुप्पी, पूरी जानकारी के साथ मौन स्वीकृति और जवाबदेही लेने से इनकार की खास शैली दिखाई देती है। अब सवाल उठता है कि उनकी भूमिका क्या थी? क्या वे पोस्ट ऑफिस या मूक दर्शक की भूमिका में थे या हमराज थे। अथवा वे परोक्ष रूप से या स्पष्टत: इन सारे बड़े घोटालों में शरीक थे, फिर चाहे व्यक्तिगत रूप से उन पर कोई दाग भी लगाया जा सकता हो? वैसे भी, 2-जी के लाइसेंस पूरी प्रक्रिया के बाद सम्प्रभु सरकार ने जारी किए थे। हालांकि, सर्वोच्च न्यायालय ने अब यह पूरी प्रक्रिया ही अवैध ठहरा दी है, जो उसने उचित ही किया है। अंतरराष्ट्र