पांच साल, 591 शिकायतें, कार्रवाई 45 पर
लोकेन्द्र सिंह तोमर | बीकानेर
@singhlokendra15
ग्रामपंचायत: तीनपीडब्ल्यूएम
आरोप: फर्जीमस्टररोल, जॉब कार्ड के सहारे भुगतान उठाना।
अधीक्षणअभियंता स्तर से जांच हुई: जांचमें करीब 16 लाख रुपए की गड़बड़ी मानी गई। कलेक्टर और संभागीय आयुक्त ने एफआईआर कराने के आदेश दिए। विभाग संतुष्ट नहीं हुआ तो दूसरी जांच कराई गई लेकिन उसके बाद फाइल बंद।
ये सिर्फ उदाहरण है। जिले के 219 सरपंच ठरके से पांच साल तक सरपंची करके चले गए। इस दौरान गबन, फर्जी मस्टररोल, फर्जी जॉब कार्ड, निर्माण में घटिया सामग्री का उपयोग करने जैसे 252 आरोप लगे मगर विभाग और राजनीति का तंत्र साथ हो तो फिर डर किस बात का। हुआ ही ठीक वैसा। विभाग ने सरपंचों पर लगे 252 आरोपों में से सिर्फ 35 पर ही कार्रवाई की। शेष मामलों की जांच पूरी तो हो गई मगर वे फाइलों में बंद करके रख दी गई। सरपंचों की 252 शिकायतों के साथ ही पंचायती राज विभाग के कर्मचारी-अधिकारियों पर भी इसी तरह के 328 आरोप लगे लेकिन इनके खिलाफ भी कारवाई दो दर्जन के आसपास ही है। पंचायतीराज विभाग और जनप्रतिनिधियों के बीच सांठ-गांठ का ही असर है कि नए सरपंच गए मगर पुरानी शिकायत निस्तारण की फाइलों को अधिकारी दबाए बैठे हैं।
कहां कितनी शिकायतें और निस्तारण
{बीकानेरपंचायतसमिति- 69जनप्रतिनििधियों के खिलाफ, 15 अन्य विभागों के और 94 कर्मचारियों के खिलाफ।
हुआक्या- पंचायतसमिति की सात अन्य विभागों के खिलाफ तीन जांच पूरी।
{लूणकरणसर पंचायतसमिति- जनप्रतिनिधियोंके खिलाफ 28, विभागों के पांच और कर्मचारियों के 36।
हुआक्या- जनप्रतिनिधियोंकी पांच अन्य विभागों की शून्य शिकायतों का निस्तारण।
{नोखा पंचायतसमिति- प्रतिनिधियोंकी 46, विभागों की पांच कर्मचारियों की 51 शिकायतें।
हुआक्या- प्रतिनिधियोंकी छह विभागों की एक शिकायत का फैसला।
{खाजूवाला पंचायतसमिति- प्रतिनिधियोंकी 24, विभागों की नौ तथा कर्मचारियों की 33 शिकायतें।
हुआक्या- प्रतिनिधियोंकी पांच, विभागों की शून्य शिकायतों का निस्तारण।
{कोलायत पंचायतसमिति- प्रतिनिधियोंकी 31, विभागों की एक तथा कर्मचारियों की 32 शिकायतें पहुंची।
हुआक्या- प्रतिनिधियोंकी चार कर्मचारियों के छह निस्तारण।
{श्रीडूंगरगढ़ पंचायतसमिति- जनप्रतिनिधियोंकी 54, विभागों की 11 तथा कर्मचारियों की 65 शिकायतें पहुंची।
हुआक्या- जनप्रतिनिधियोंकी आठ, विभागों की चार शिकायतें निस्तारित।
अब क्या होगा इन जांचों का
बीतेसमय जो सरपंच रहे हैं। यदि उन पर भ्रष्टाचार के आरोप हैं और जांच में दोषी पाए गए तो उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज हो सकती है। रिकवरी भी हो सकती है लेकिन अन्य आरोपों पर विशेष कार्रवाई नहीं बनती। कलेक्टर-कमिश्नर को भी हस्तक्षेप करना होगा।
कुछ फर्जी भी हैं शिकायतें
शिकायतोंका आंकड़ा भले ही लंबा हो मगर इसमें कुछ फर्जी और राजनीतिक रंजिश की भी शिकायतें हैं मगर विभाग की जिम्मेवारी है कि उसकी जांच कराकर पूरी तस्वीर सामने रखे।
क्या वजह निस्तारण नहीं होने की
जोभी शिकायतें सरपंचों के खिलाफ विभाग के पास पहुंची। उसे सबसे पहले तो विभाग स्तर पर सांठ-गांठ और बंद कमरों में बातचीत कर उसे दबाने की कोशिश होती है। यदि विभाग स्तर नहीं दबा तो जांच प्रभावित करने की कोशिश होती है। जांच पर भी नियंत्रण नहीं हुआ तो बड़े नेताओं से दबाव डालकर कार्रवाई रुकवाई जाती है। कई ऐसे भी मामले हैं जिसमें विभाग के अधिकारी ही उस जांच को खुर्द-बुर्द कराने का प्रयास करते हैं। इसमें ग्रामसेवक, जेईएन-एईएन से लेकर उच्चाधिकारी तक शामिल होते हैं। चूंकि सरपंचों का बड़े प्रतिनिधियों से सीधा संपर्क होता है इस कारण उन्हें भी हस्तक्षेप करना पड़ता है।
^बीते पांच सालों में जो भी आरोप लगे ऐसी फाइलों को सूचीबद्ध किया जा चुका है। कुछ ऐसी फाइलें भी हैं जिनकी जांच हो गई मगर अब तक कार्रवाई नहीं हुई। अब जिन मामलों की जांच नहीं हुई उनकी जांच कराएंगे। जहां कार्रवाई की जरूरत है वहां कार्रवाई होगी। बी.एल.मेहरड़ा,मुख्य कार्यकारी अधिकारी जिला परिषद