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उत्पीड़न की स्थिति में सोचने से बेहतर है, कदम उठाया जाए

5 वर्ष पहले
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इस नीति पर मैं चलती हूं - बुरे के लिए तैयार रहो, श्रेष्ठ की उम्मीद करो और जो सामने आए उसका पूरी ताकत से सामना करो।

जिन श्रेष्ठ चीजों के आप हकदार हैं या जिन्हें आप अपने लिए चाहते हैं उनके लिए खुद को समर्पित कर दीजिए। अपने दिमाग को शांति रखिए।

ताकत और हिंसा एक-दूसरे से उलट है। जहां एक चीज पूरी तरह से मौजूद होती है, दूसरी वहां बिल्कुल नहीं हो सकती। जब ताकत संकट में होती है तभी हिंसा दिखाई देती है। लेकिन तब हिंसा खत्म करने के लिए फिर दूसरी ताकत सामने आती है।

सबसे ज्यादा सुधारवादी और क्रांतिकारी क्रांति के ठीक बाद संकीर्ण विचार वाले होते देखे जाते हैं।

जो काम हमें करना है उसे करने के पहले सीखना चाहिए। और सीखने का सबसे अच्छा तरीका है उस काम को करना।

उत्पीड़न और प्रताड़ना की स्थिति में सोचने में समय लगाने से बेहतर है कि कोई कदम उठाया जाए।

हमारे युग में अगर कोई अजाद होना चाहता है तो उसके पास सोचने की ताकत होनी चाहिए। और यह उसमें आजादी की उम्मीद जगाने के लिए काफी है।

जन नेता बनने की सबसे बड़ी योग्यता यह है कि उस व्यक्ति को कभी कोई गलती नहीं करना चाहिए। वह कभी कोई गलत कदम नहीं उठा सकता।

संस्कृति चीजों पर निर्भर करती है और यह दुनिया में दिखाई देती है। और मनोरंजन लोगों पर निर्भर करता है और यह उनके जीवन में दिखाई देता है।

कोई भी चीज जो हम इस्तेमाल कर सकते हैं या छू सकते हैं या सुन सकते हैं उसे ठीक वैसे ही शब्दों में बयां नहीं कर सकते जैसा महसूस करते हैं।

युद्ध ऐसी लग्जरी है, जिसे सिर्फ छोटे देश ही वहन कर सकते हैं।

वादे करना भविष्य के बारे में बता देने और उसे तय कर देने की कोशिश का इंसान का अनोखा तरीका है।

झूठ बोलने और धोखा देने के साथ समस्या यह है कि इसमें कुशलता इस बात पर निर्भर करती है कि जो झूठ बोला जा रहा है उसका कारण या अभिप्राय क्या है। वह किसी के भले के लिए है या बुराई के लिए।

जब आप बाहर होते हैं तो जीवन से प्यार करना आसान हो जाता है। जहां कोई आपको पहचानता नहीं है और अपने जीवन का हर पल, हर फैसले पर सिर्फ आपका नियंत्रण होता है। अन्य समय के मुकाबले तब आपका जीवन पूरी तरह आपके हाथों में होता है।

सबसे बड़ी गलतियां या पाप वो लोग करते हैं जो कभी यह तय नहीं कर पाते कि क्या सही है और क्या गलत या क्या पाप है और क्या पुण्य।

अमेरिकन दार्शनिक विचारक। हालांकि वे खुद को दार्शनिक नहीं मानती थीं। जर्मनी में यहूदियों पर हो रहे हमलों के दौर में वे यूरोप छोड़कर अमेरिका गई थीं।

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