मनमोहन सिंह के निशाने पर प्रधानमंत्री का मौन
प्रधानमंत्री रहते हुए मनमोहन सिंह की चुप्पी की बहुत चर्चा थी। 20 महीने पहले यह पद छोड़ने के बाद भी वे कुल-मिलाकर घटनाओं के खामोश पर्यवेक्षक ही बने रहे। मगर अब जब अर्थव्यवस्था फिर मुश्किल में है और कई राजनीतिक मुद्दों पर नरेंद्र मोदी सरकार सवालों से घिरी है, तो डॉ. सिंह ने अपनी चुप्पी तोड़ी है। इसके लिए माध्यम एक अंग्रेजी पत्रिका को बनाया। उसे इस मौके पर लंबा इंटरव्यू देने का मतलब यही है कि डॉ. सिंह की राय में मोदी सरकार की आलोचना का सही समय गया है। सरकार की अर्थनीति और विदेश नीति को निशाने पर लेने के साथ-साथ उन्होंने प्रधानमंत्री की कार्यशैली पर भी सवाल उठाए हैं। नरेंद्र मोदी ने एक समय तत्कालीन प्रधानमंत्री को ‘मौनमोहन सिंह’ कह कर कटाक्ष किया था। विडंबना ही है कि डॉ. सिंह ने वही आलोचना अब वर्तमान प्रधानमंत्री को लौटाई है। कथित असहिष्णुता से संबंधित प्रश्न पर डॉ. सिंह ने कहा है कि लोग अपेक्षा रखते हैं कि प्रधानमंत्री जनमत को संभालने में अग्रणी भूमिका लें, लेकिन उन्होंने (मोदी) कभी जुबान नहीं खोली- चाहे वो गोमांस समस्या हो या मुजफ्फरनगर अथवा अन्य जगहों पर हुई घटनाएं। वे चुप रहे हैं। मनमोहन सिंह की दूसरी बड़ी शिकायत है कि प्रधानमंत्री विपक्ष को साथ में लेकर नहीं चलते। इन्हीं दोनों बातों के सिलसिले में उन्होंने तल्ख लहजे में मोदी को याद दिलाने की कोशिश की कि वे ‘पूरे भारत के प्रधानमंत्री हैं।’ अर्थव्यवस्था के मामले में मनमोहन सिंह की राय है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के भाव गिरने से सरकार को इसे गति देने का अनोखा अवसर मिला, लेकिन समन्वित प्रयास के अभाव में इसे गंवा दिया गया। विदेश नीति के संदर्भ में पूर्व प्रधानमंत्री ने यह तो माना कि शक्तिशाली देशों से भारत के रिश्ते सुधरे हैं, मगर पड़ोसी देशों- खासकर पाकिस्तान और नेपाल- के मामले में मोदी सरकार पर असंगत रुख अपनाने का आरोप उन्होंने लगाया। कुल मिलाकर मनमोहन सिंह ने वर्तमान सरकार को विफल चित्रित करने का प्रयास किया है। इस पर भाजपा की कड़ी प्रतिक्रिया आना लाजिमी था। उसने मनमोहन सिंह को विभिन्न मोर्चों पर उनकी सरकार के रिकॉर्ड की याद दिलाई है, लेकिन बेहतर होगा कि वह अपनी सरकार के रिकॉर्ड का तथ्य एवं विवेकपूर्ण दलीलों के साथ बचाव करे, इसलिए कि मनमोहन सिंह सरकार के बारे में जनता अपना फैसला सुना चुकी है। वैसे भी आवश्यकता यह है कि राजनीतिक बहसों को अब सकारात्मक रूप दिया जाए।