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अर्द्धवार्षिक परीक्षा में हाथ से लिखे पेपर दिए

7 वर्ष पहले
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बांसवाड़ा। किसी स्कूल में हाथ से लिखे हुए पेपर की फोटो काॅपी दी तो किसी स्कूल में बोर्ड पर ही प्रश्न पत्र लिख कर बच्चों को उत्तर लिखने के लिए कह दिया गया। सरकारी स्कूलों में शुक्रवार से शुरू हुई अद्धवार्षिक परीक्षाओं में यही हाल दिखे। विभाग की लापरवाही साफ सामने नजर आई।
तीन साल पहले समान परीक्षा व्यवस्था खत्म कर दी थी, इसके बाद एसएसए की ओर से प्रति बालक 4 रुपए की राशि स्कूल को दी जाती थी। ताकि स्कूल मैनेजमेंट अपने स्तर पर पेपर निर्माण कराकर बच्चों को दे ओर बच्चों को प्रिंटेड पेपर मिल सके, लेकिन यह व्यवस्था अब खत्म कर दी है। इसलिए स्कूल के संस्थाप्रधान की ही जिम्मेदारी है कि वह परीक्षा कैसे कराए। जिसके तहत कई जगहों पर बॉर्ड पर ही प्रश्न लिखकर बताए गए। समान परीक्षा व्यवस्था केवल कक्षा 9 से 12 तक के लिए लागू है।

संस्था प्रधान क्या करें, बजट ही नहीं : दूसरी ओर स्कूल में बच्चों की पढ़ाई पूरी तरह से निशुल्क होती है। विकास फंड में भी बजट नहीं होता है। इसलिए संस्थाप्रधानों के पास केवल दो ही विकल्प रहते है। या तो पेपर बोर्ड पर लिखे या फिर हाथ से लिखकर फोटो कॉपी कराए। इस संबंध में शिक्षक संघ राष्ट्रीय के अध्यक्ष गमीरचंद पाटीदार का कहना है कि सरकार ने 4 रुपए की राशि भी बंद कर दी है, जो पहले सर्व शिक्षा अभियान से उपलब्ध कराई जाती थी।

यह सिस्टम उचित नहीं : रिटायरउपनिदेशक हरीप्रकाश रोत का कहना है कि एक ओर हम एसएसए के माध्यम से बच्चों की गुणवत्ता को लेकर रीडिंग कैंपेन, संबलन अभियान जैसे कार्यक्रम संचालित करते है तो दूसरी ओर परीक्षा को लेकर यह सिस्टम उचित नहीं है। क्योंकि एक जैसा पेपर नहीं आएगा, तो बच्चे की गुणवत्ता का आंकलन कैसे होगा। अभी तो स्कूल स्तर पर ही सब कुछ हो रहा है यह तो शिक्षक को भी पता है और बच्चे भी जानते है। ऐसे में मूल्यांकन सही हो पाएगा, यह कहना कठिन होगा।

''यह व्यवस्था विभाग की है। विभाग ने समान परीक्षा व्यवस्था खत्म कर दी है। परीक्षा आयोजन को लेकर व्यवस्था की जिम्मेदारी संस्थाप्रधान के हाथों में होती है। ऐसे में संस्थाप्रधान ही तय करता है कि परीक्षा का बेहतर संचालन कैसे किया जाए।'' -केएल रेंगर, डीईओप्रारंभिक शिक्षा।
(परतापुर: बेड़वास्कूल में आठवीं कक्षा के हिंदी विषय का हस्तलिखित पेपर।)