फटाफट फॉर्मेट में उपजी बुराइयां दूर हों
िक्रकेटरों कोरातों-रात धनवान बनाने वाला टी-20 फॉर्मेट को तीखी आलोचनाओं से गुजरना पड़ रहा है। कुछ लोगों का तर्क है कि इस फॉर्मेट से खेल की तकनीक पर बुरा असर पड़ा है, जबकि कुछ लोगों का मत है कि टी-20 फॉर्मेट खेल कम, व्यापार ज्यादा है जिसके कारण नैतिक मूल्यों में गिरावट रही है। मेरे ख्याल से दोनों ही तर्क गलत नहीं हैं। ऐसे कई प्रमाण मौजूद हैं जिसमें तकनीक की गिरावट आैर नैतिक मूल्यों का पतन का उदाहरण दिया जा सकता है। यदि तकनीक की चर्चा करें, तो कई खिलाड़ी ऐसे हैं, जिनमें टेस्ट क्रिकेटर के रूप में स्थापित होने की क्षमता थी, लेकिन वे टी-20 में धमाल मचाकर ही रह गए। टी-20 की रही सही कसर स्पॉट फिक्सिंग ने पूरी कर दी। यह कहा जा सकता है कि टी-20 क्रिकेट ने खेल को आैर खिलाड़ी को पथभ्रष्ट किया है। इससे खिलाड़ी धनवान जरूर बन रहे हैं, लेकिन उनका केवल नैतिक पतन हो रहा है बल्कि खिलाड़ी अपार धन कूट रहे हैं।
टी-20 क्रिकेट का भविष्य में जो भी हश्र हो, लेकिन चार दशक पहले जब वनडे क्रिकेट का फॉर्मेट आया, तो यह कह कर काफी शोर मचाया गया था कि इससे टेस्ट क्रिकेट को आघात पहुंचेगा। वनडे क्रिकेट की जड़ें पिछले चार दशक में मजबूत जरूर हुई हैं, लेकिन जब इस फॉर्मेट की लोकप्रियता थोड़ी कम हुई तो क्रिकेट के नए अवतार के रूप में टी-20 फॉर्मेट परोसा गया। वनडे हो या टी-20 क्रिकेट लेकिन सच्चाई यह है कि टेस्ट क्रिकेट को खत्म नहीं किया जा सका है। हां, इन फॉर्मेटों से टेस्ट क्रिकेट तेज हो गया है आैर उसकी कलात्मक खूबसूरती गायब होती जा रही है। ड्रॉ के बजाय सीधे नतीजे आने लगे हैं। पिछले दस सालों में 70 प्रतिशत टेस्ट क्रिकेटरों का जीत या हार का स्पष्ट नतीजा आया। मैच में नतीजा आए यह तो हर कोई चाहेगा लेकिन खराब तकनीक के कारण बल्लेबाज जल्दी-जल्दी आउट होकर विकेट गंवाए यह कौन चाहेगा। जहां तक टी-20 का सवाल है, तो इस फॉर्मेट को युवा वर्गों ने सबसे ज्यादा पसंद किया। टी-20 यदि युवा दिलों में जगह बना सका है, तो इसके लिए फॉर्मेट दोषी नहीं है। इस फॉर्मेंट में आखिरी गेंद तक रोमांच होता है।
युवा क्रिकेटर बहुत फॉर्मेट में खेलते हैं। वे सिर्फ टेस्ट खेल कर अपना कॅरिअर नहीं बनना चाहते हैं। यही कारण है कि वे स्वयं को सभी फॉर्मेट में झोंक कर विशेषज्ञता हासिल करना चाहते हैं। आखिर इसमें गलत क्या है? मेरे ख्याल से गलत यह है कि इ