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देवी अाराधना पर्व

7 वर्ष पहले
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बागौरी माता लोगों को डाकुओं के अाने से पहले ही कर देती थी सचेत

पावटा| भौनावासके समीप बागौरी के पहाड़ों में विराजमान माता पहले ब्रह्माणी के रूप में जानी जाती थी, लेकिन बागौरी के पहाड़ों में मंदिर बनने के बाद इसे बागौरी माता के नाम से जाने जाना लगा। बुजुर्गों के मुताबिक लगभग पांच सौ वर्ष पूर्व एक बुजुर्ग महिला को पहाड़ के ऊपर देवी के रूप में एक महिला दिखाई दी। बुजुर्ग महिला उसको पास से देखने के लिए पहाड़ पर चढ़ने लगी लेकिन आधी दूरी पर पहुंचने के बाद बुजुर्ग महिला से आगे नहीं चढ़ा गया तो उसने उस देवी स्वरूप महिला से आग्रह किया कि यदि तुम वास्तव में देवी स्वरूपा हो तो मेरे पास आओ यह बात सुन कर वह देवी स्वरूपा महिला बुजुर्ग महिला के पास आकर उसे दर्शन देकर वहीं पर अंतर्ध्यान हो गई बुजुर्ग महिला ने गांव में आकर इस घटना की जानकारी लोगों को दी तो किसी को विश्वास नहीं हुआ लेकिन उसी रात वहां के राजा आसकरणजी को यह ब्रह्माणी सपने में दिखाई दी, दूसरे दिन आसकरण ने वहां पहुंच कर देखा तो वहां पर एक मूर्तिनुमा छोटा सा पत्थर पड़ा हुआ था, उन्होंने वहीं पर एक छोटा सा मंदिर बना कर उसकी पूजा अर्चना शुरू कर दी। उनके साथ साथ गांव के लोगों ने भी इस मूर्ति की पूजा अर्चना शुरू कर दी तो लोगों की मनोकामनाएं पूरी होने लगी लोगों का कहना है कि जब भी गांव में डाकू, चोर या कोई अनहोनी घटना होती थी तो घटना घटित होने पहले ही यह मूर्ति बोल कर लोगों को सचेत कर देती थी जिससे इसकी महिमा और बढ़ गई मूर्ति को बोलते हुए देखकर एक बार डाकुओं ने इसका सिर काट दिया। बाद में लोगों ने दुबारा इसका शीश लगवाया इसके बाद अनेक भामाशाहों ने इसके मंदिर को और भी भव्य बनाकर आने वाले श्रद्धालुओं के लिए सभी सुविधाएं मुहैया करा दी। नवरात्रों पर पूजा अर्चना करने वालों जात जड़ूले देने वालों का तांता लगा रहता है।