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पगडंडी के सहारे कालिका मंदिर पहुंचते हैं श्रद्धालु

4 वर्ष पहले
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जानागढ़ किले के पुरातन अवशेषों को संरक्षण की दरकार, कोई ध्यान नहीं दे रहा है

प्रतापगढ़जिले में कई पुरातन अवशेषों को संरक्षण की दरकार है। पीपलखूंट से करीब 20 किमी दूर पंडावा पंचायत और पंचायत रतनपुरिया की सीमा पर पहाड़ी पर बने पुराने जानागढ़ के किले और वहां के पुरातन अवशेषों को संरक्षण की आवश्यकता है। जमीन से करीब 6 किमी ऊंचाई पर बसे इस किले में कालिका माता का पुराना मंदिर है, जहां हर दिन रविवार को सैकडों की तादात में श्रद्धालु दर्शन को आते हैं, लेकिन यहां पहुंचने के लिए एक मात्र पगडंडी है, जो कच्ची है। बारिश के दिनों में वहां पहुंचने के लिए श्रद्धालुओं को भारी परेशानी होती है।

किले बिखरे अवशेषों को महाभारत कालसे जोड़ते ग्रामीण : जानागढ़किले, आसपास के तालाब और पुराने खंडहरों को लेकर कई किवदंतियों हैं। ग्रामीणों के अनुसार किले, प्राचीन तालाब का निर्माण पांडवों ने वनवास काल के दौरान किया था। प्राचीन तालाब में बारह मास पानी भरा रहता है। पास ही में एक प्राचीन बावड़ी है। दस फीट गहरी मानव निर्मित इस बावडी में बारहों महीने पानी भरा रहता है। इस तालाब, बावड़ी का मुख्यमंत्री जल स्वावलंबन योजना में जीर्णोद्घार करें तो मंदिर में जाने वाले लोगों के लिए पेयजल उपलब्ध हो सकता है।

खंडहर में कच्चे झोपड़े में बना है कालिका माता का मंदिर

जानागढकिले स्थित प्राचीन कालिका माता मंदिर जिसे आदिवासी जानागढ़ माता के नाम से जानते हैं। एक खड्‌डनुमा स्थान पर है। कई बार ग्रामीणों ने इस मंदिर के पक्के निर्माण के लिए जनप्रतिनिधियों से गुहार भी लगाई, लेकिन किसी ने इस ओर ध्यान नहीं दिया इससे पहले माता की सेवा पूजा थावरा हरमोर किया करते थे। हर रविवार को यहां माता की चौकी होती है, जिसमें सैकडों श्रद्धालु मन्नत के लिए आते हैं मन्नत पूरी होने पर यहां जगराता कर प्रसादी करते हैं। मंदिर पर पहुंचने के लिए मार्ग नहीं हैं पीने के पानी की भी कोई समुचित व्यवस्था नहीं है, जिससे श्रद्धालुओं परेशानी उठानी पड़ती है।

घंटाली। जानागढ़ किले में स्थित प्राचीन बावड़ी, इसे संरक्षण की दरकार है।

अनदेखी

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