इन मामलों में ऐसा ही हुआ
सच छुपाने गुम कर दी जाती हैं सरकारी फाइलें
कईबड़ेसच को छुपाने के लिए सरकारी दफ्तरों से महत्वपूर्ण दस्तावेज और फाइलें गुम हो जाती हैं, लेकिन विभाग इनका कोई पता नहीं लगा पाता। विभाग दस्तावेज चोरी की एफआईआर दर्ज करा देता है और पुलिस भी तफ्तीश पूरी कर एफआर लगा देती है। उन फाइलों में दबा सच उन्हीं के साथ दफन हो जाता है। एेसे में इसके पीछे साजिश होने या किसी को बचाने के सवाल तो खड़े हो ही जाते हैं। ऐसे कई मामलों में विभागीय कर्मचारी की भूमिका भी सामने आई है।
कोटड़ा में कोर्ट के चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी ने छह मामलों की पत्रावलियां चोरी कर ली थी। इन्हें वापस करने के लिए पांच हजार रुपए की मांग की थी। पांच पत्रावलियां ही लौटाई गईं थी, एक पत्रावली वापस नहीं मिली थी। कोर्ट की ओर से एफआईआर दर्ज कराने पर पुलिस ने तफ्तीश पूरी कर चालान पेश किया था। विधानसभा सत्र के दौरान भी यह मुद्दा उठाया गया था।
केस 4 }चित्तौडगढ़में एडीएम भू अभिलेख कार्यालय के रिकॉर्ड रूम का ताला तोड़कर राजस्व रिकॉर्ड चोरी हुआ। मई 2014 में एफआईआर दर्ज कराई गई। आरोपी का पता नहीं चलने पर मामले में एफआर लगी।
क्यों}राजस्वरिकॉर्डके गायब होने से सबसे बड़ी परेशानी यह रहती है कि जमीन के पुराने रिकॉर्ड का पता लगाना मुश्किल हो जाता है। ऐसे में भूमाफिया इसका फायदा उठाकर जमीन का लेनदेन कर लेेते है
केस 3 }राजसमंदमें पंचायत कार्यालय से पट्टा संबंधी रिकॉर्ड चोरी हो गया। जून 2012 में एफआईआर दर्ज कराई गई। आरोपी का पता नहीं चलने पर पुलिस ने एफआर लगाई।
क्यों}पट्टेकारिकॉर्ड गायब होने से यह पता लगाना मुश्किल हो जाता है कि कौन से पट्टा किसके नाम पर है। इसकी आड़ में भू माफिया सक्रिय हो सकते हैं।
अधिकारी चोरी से भी नहीं लेते सबक
महत्वपूर्ण दस्तावेजों के चोरी होने के बाद भी विभाग के अधिकारी इससे कोई सबक नहीं लेते हैं और आगे चोरी तो इसके लिए कोई प्रयास नहीं किए जाते। चोरी के अधिकतर मामलों के सामने आने के अधिकारियों ने अधीनस्थ कर्मचारियों को ध्यान रखने के निर्देश दिए, लेकिन तो सीसीटीवी कैमरे लगाए गए और ही चौकीदार तैनात किए गए।
2009 से जून 2014 तक राज्य में सरकारी दफ्तरों से दस्तावेज चोरी होने के 119 मामले दर्ज हुए थे। आरोपी का पता नहीं चलने पर पुलिस ने 92 में तो एफआर लगा दी। यह दस्तावेज राज्य के विभिन्न जिलों के कलेक्ट्र