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अकाल में त्राहि-त्राहि मची तो माता ने दिया आसरा

7 वर्ष पहले
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राजगढ़ की पहाड़ी वाली अन्नपूर्णा माता

राजसमंद. राजनगरमें राजगढ़ की पहाड़ी पर राज मंदिर अन्नपूर्णा माता के नाम से विख्यात है। मंदिर में नवरात्रा के दिनों में पूजन, जागरण, हवन से देवी की आराधना की जाती है। कहते हैं रोली, लच्छा, हवन की भभूत को धारण करने मात्र से कष्टों का निवारण होता है। तीन सौ साल पूर्व मेवाड़ में लगातार अकाल की विभीषिका चल रही थी। इससे जनता, अन्न, धन, पानी की तलाश में अन्य प्रदेशों में जाने लगे। तब महाराणा राजसिंह ने विद्वान-पंडितों से परामर्श कर जगदम्बा मां अन्नपूर्णा की स्थापना करवाई। अकाल राहत के लिए राजसमंद बांध निर्माण कराया। मंदिर में राजराजेश्वरी जगदम्बा मां अन्नपूर्णा की प्राण-प्रतिष्ठा महाराणा राजसिंह द्वारा करवाई गई। किवदंती है कि मां अन्नपूर्णा की स्थापना के बाद महाराजा राजसिंह की प्रजा को अकाल से राहत मिली। आगे चलकर स्वर्णयुग काल कहलाया। मां अन्नपूर्णा के आशीर्वाद से राज्य में धन-धान्य की बारिश हुई और अकाल खत्म होकर सुकाल गया।