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जब से उसको देखा मन को खूब भा गई.. पर बजी तालियां

6 वर्ष पहले
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राजसमंद |राजस्थान साहित्यकारपरिषद कांकरोली की मासिक गोष्ठी मुरलीधर कनेरिया स्नेहिल की अध्यक्षता में हुई।

गोष्ठी का शुभारंभ नगेन्द्र मेहता की रचना जब से उसको देखा मन को खूब भा गई.. से की गई। ईश्वरचन्द्र शर्मा ने रोशनलाल नाम के व्यक्ति के माध्यम से शायद वहीं यमराज होगा, भटकने वाला प्राणी के माध्यम से अपने मनोभावों को अभिव्यक्ति दी। त्रिलोकी मोहन पुरोहित ने राजस्थानी में सगला रोटी चाहिजे... छोटा मानुष री भूख मांगे दो मुट्ठी धान के साथ साथ जितना तुझको याद किया उतना ही तो करता हूं... रचना प्रस्तुत की। शेख अब्दुल हमीद ने गल आंखों में रहा दिल में उतरकर नहीं देखा, कश्ती के मुसाफिर ने समन्द को नहीं देखा की प्रस्तुति दी।

जवानसिंह सिसोदिया ने भी गल वो घर से बेनकाब निकले तो रास्ता जमा हो गए। नजर उठाकर मुस्करा दे तो कत्लेआम हो जाए द्वारा गुदगुदाया। राधेश्याम सरावगी ने चुराऊं, निन्दिया जो हमारी है, राधे श्याम के पुजारी है... रचना प्रस्तुत की। किशन कबीरा ने व्यंग्यात्मक रचना उलटबासी के माध्यम से हम नींद पर सवार हो गए है कुत्ते सो रहे निश्चिन्त होकर हम कुत्ते पर भौंकने लगे... प्रस्तुत की। अफजल खान ने चलना ही चलना है अकेले राह में... रचना सुनाई। कमर मेवाड़ी ने खुशबू फैले इंसानियत रचना के माध्यम से आतंक, दहशत का 21वीं शताब्दी में भी अंत होने की बात करते हुए इंसानियत की खुशबू से सराबोर होने पर जोर दिया।