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हमारे हाथ में है संस्कारों को बदलना निर्माण करना: संत
राजसमंद|संत शुभकरणने कहा कि अध्यात्म की दुनिया में वृद्धि करने वाले तत्व है अध्ययन, आराधना, साधना और अनुभव है लेकिन इन तत्वों को समझने की भावना आदमी में तब तक पैदा नहींं होती है, जब तक हमारे पूर्व संस्कार हमें अध्यात्म की ओर नही ले जाते।
वे रविवार को सम्बोधि उपवन ट्रस्ट धानीन में रविवारीय ध्यान शिविर को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि संस्कारों को बदलना हमारे हाथ में है। संस्कारों का निर्माण करना भी हमारे हाथ में है। आज के इस युग में अध्यात्म की साधना कम हो गई है क्योंकि आदमी पदार्थों और अर्थ कमाने में ही रह जाता है लेकिन हमारा जीवन जो हमें प्राप्त है। वह हवा के झौके के समान है। इसलिए हमें एक क्षण का भी प्रमाद नहीं करना चाहिए। अहंकार, मोह, माया, ईर्ष्या लोभ आदि ये सब चोर हैं। ये सब हमारे भीतर बैठे हुए हैं। सुख और दु:ख ये सब प्रमाद है इसलिए भगवान ने तीसरी दृष्टि दी है और वह है समभाव। समभाव का मतलब है दोनों परिस्थिति में समान रहना। समभाव रखने से हम प्रमाद से बच जाएंगे। यह हमारी चेतना को जाग्रत करता है और हमारी शक्ति का जागरण होगा। अत: समता की साधना , चेतना शक्ति के जागरण के लिए हमें नियमित ध्यान साधना करनी चाहिए।