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बधिर बच्चों की सर्जरी कर सेट किया उपकरण

6 वर्ष पहले
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मथुरादासमाथुर अस्पताल में रविवार को सभी छह बच्चों की कॉकलियर इंप्लांट सर्जरी का काम पूरा कर लिया गया। इनमें से तीन बच्चों की सर्जरी शनिवार शेष की रविवार को की गई। अहमदाबाद के सिविल हॉस्पिटल के ईएनटी विभागाध्यक्ष डॉ. विश्वकर्मा के नेतृत्व में एमडीएमएच के डॉक्टरों ने बच्चों के सिर में सर्जरी से कॉकलियर उपकरण इंप्लांट किया। अब एक माह बाद उपकरण का स्विच ऑन कर कम्प्यूटर से वॉयस सेट की जाएगी। इसके बाद ये बच्चे सुन सकेंगे।

इनबच्चों की हुई सर्जरी

रविवारको जोधपुर के पांच साल के तन्मय भाटी, दक्ष चावला साढ़े चार साल के ध्रुव जलवानी की सर्जरी की गई। जबकि शनिवार को पाली के देव जैन, जोधपुर की खुशी पोकरण के धन्नंजय की सर्जरी की गई थी। इससे पहले जून 2014 में पांच बच्चों की सर्जरी हुई थी।

सुननेके बाद स्पीच थैरेपी की ट्रेनिंग

कॉकलियरका स्विच ऑन होने के बाद बच्चे सुन सकेंगे। फिर उन्हें स्पीच थैरेपी की ट्रेनिंग देकर सुनकर रिस्पॉन्स करना सिखाया जाएगा। इससे जन्म से बहरे बच्चे भी नॉर्मल बच्चों की तरह बोल-सुन सकेंगे। यह ट्रेनिंग एक साल से अधिक चलेगी।

डॉक्टरोंकी इस टीम ने की सर्जरी

सर्जरीमें डॉ. भारती सोलंकी, डॉ. स्निग्धा भंडारी, डॉ. सोनू परमार, डॉ. दिलीप यादव, डॉ. अनिता, डॉ. अंकित, डॉ. योगेश कुरानी डॉ. हरिओम गौतम शामिल थे। एनेस्थिसिया टीम में एचओडी डॉ. दिलीपसिंह चौहान के नेतृत्व में डॉ. एमएल टाक, डॉ. सरिता जनवेजा, डॉ. मनोज कमल, डॉ. संदीप, डॉ. तनुजा डॉ. विनीत शामिल थेे। साथ ही नर्सेज गजेंद्रसिंह, सलीम खान हरीश गौतम ने भी सहयोग किया।

सर्जरीसे उपकरण को दोनों भागों में लगाया जाता है

ईएनटीकी एचओडी डॉ. भारती सोलंकी ने बताया कि जन्मजात बहरों के कान में कॉकलियो नर्व से जुड़ी नसें क्षतिग्रस्त होती हैं। ऐसे में सर्जरी से कॉकलियर इंप्लांट कर सुनने में सक्षम बनाया जाता है। उपकरण दो भाग में लगाए जाते हैं। पहला भाग इलेक्ट्रोड को कॉकलियो (हड्डी वाले भाग) में सेट किया जाता है। जबकि दूसरा भाग कान के पीछे की हड्डी (मेस्टोइड बॉन) में छेद कर लगाया जाता है। इन्हें नर्व से जोड़ा जाता हैं। हड्डी के ऊपर इसी भाग पर चुंबक की तरह बाहर की यूनिट लगती है। कम उम्र में ही कॉकलियर इंप्लांट कारगर होता है।

मस्तिष्कतक जाने वाली 8वीं नस से पहुंचती है आवाज

डॉक्टरोंके अनुसार इंप्लांट से पहले मरीज की जांच कर यह पता लगाया जाता है कि यह उसके लिए कितना कारगर साबित होगा। इसके लिए जरूरी है कि कान से मस्तिष्क तक जाने वाली आठवीं नस (वेस्ट ब्लो कॉकलियर नर्व) ठीक हो, क्योंकि इंप्लांट के माध्यम से लगने वाले इलेक्ट्रॉड के सक्रिय होने के बाद इसी नस के माध्यम से मस्तिष्क तक ध्वनि संकेत पहुंचते हैं।

हेल्थ रिपोर्टर | जोधपुर

मथुरादासमाथुर अस्पताल में रविवार को सभी छह बच्चों की कॉकलियर इंप्लांट सर्जरी का काम पूरा कर लिया गया। इनमें से तीन बच्चों की सर्जरी शनिवार शेष की रविवार को की गई। अहमदाबाद के सिविल हॉस्पिटल के ईएनटी विभागाध्यक्ष डॉ. विश्वकर्मा के नेतृत्व में एमडीएमएच के डॉक्टरों ने बच्चों के सिर में सर्जरी से कॉकलियर उपकरण इंप्लांट किया। अब एक माह बाद उपकरण का स्विच ऑन कर कम्प्यूटर से वॉयस सेट की जाएगी। इसके बाद ये बच्चे सुन सकेंगे।

इनबच्चों की हुई सर्जरी

रविवारको जोधपुर के पांच साल के तन्मय भाटी, दक्ष चावला साढ़े चार साल के ध्रुव जलवानी की सर्जरी की गई। जबकि शनिवार को पाली के देव जैन, जोधपुर की खुशी पोकरण के धन्नंजय की सर्जरी की गई थी। इससे पहले जून 2014 में पांच बच्चों की सर्जरी हुई थी।

सुननेके बाद स्पीच थैरेपी की ट्रेनिंग

कॉकलियरका स्विच ऑन होने के बाद बच्चे सुन सकेंगे। फिर उन्हें स्पीच थैरेपी की ट्रेनिंग देकर सुनकर रिस्पॉन्स करना सिखाया जाएगा। इससे जन्म से बहरे बच्चे भी नॉर्मल बच्चों की तरह बोल-सुन सकेंगे। यह ट्रेनिंग एक साल से अधिक चलेगी।

डॉक्टरोंकी इस टीम ने की सर्जरी

सर्जरीमें डॉ. भारती सोलंकी, डॉ. स्निग्धा भंडारी, डॉ. सोनू परमार, डॉ. दिलीप यादव, डॉ. अनिता, डॉ. अंकित, डॉ. योगेश कुरानी डॉ. हरिओम गौतम शामिल थे। एनेस्थिसिया टीम में एचओडी डॉ. दिलीपसिंह चौहान के नेतृत्व में डॉ. एमएल टाक, डॉ. सरिता जनवेजा, डॉ. मनोज कमल, डॉ. संदीप, डॉ. तनुजा डॉ. विनीत शामिल थेे। साथ ही नर्सेज गजेंद्रसिंह, सलीम खान हरीश गौतम ने भी सहयोग किया।

सर्जरीसे उपकरण को दोनों भागों में लगाया जाता है

ईएनटीकी एचओडी डॉ. भारती सोलंकी ने बताया कि जन्मजात बहरों के कान में कॉकलियो नर्व से जुड़ी नसें क्षतिग्रस्त होती हैं। ऐसे में सर्जरी से कॉकलियर इंप्लांट कर सुनने में सक्षम बनाया जाता है। उपकरण दो भाग में लगाए जाते हैं। पहला भाग इलेक्ट्रोड को कॉकलियो (हड्डी वाले भाग) में सेट किया जाता है। जबकि दूसरा भाग कान के पीछे की हड्डी (मेस्टोइड बॉन) में छेद कर लगाया जाता है। इन्हें नर्व से जोड़ा जाता हैं। हड्डी के ऊपर इसी भाग पर चुंबक की तरह बाहर की यूनिट लगती है। कम उम्र में ही कॉकलियर इंप्लांट कारगर होता है।

मस्तिष्कतक जाने वाली 8वीं नस से पहुंचती है आवाज

डॉक्टरोंके अनुसार इंप्लांट से पहले मरीज की जांच कर यह पता लगाया जाता है कि यह उसके लिए कितना कारगर साबित होगा। इसके लिए जरूरी है कि कान से मस्तिष्क तक जाने वाली आठवीं नस (वेस्ट ब्लो कॉकलियर नर्व) ठीक हो, क्योंकि इंप्लांट के माध्यम से लगने वाले इलेक्ट्रॉड के सक्रिय होने के बाद इसी नस के माध्यम से मस्तिष्क तक ध्वनि संकेत पहुंचते हैं।