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उपचुनाव में भाजपा को तगड़ा झटका

7 वर्ष पहले
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उपचुनावों केताजा नतीजों का संदेश यही है कि भारतीय जनता पार्टी को अपनी रणनीति पर नए सिरे से विचार करना होगा। खासतौर पर उत्तरप्रदेश और राजस्थान में उसे जो तगड़ा झटका लगा, उसके राजनीतिक सबक से उसे आंखें नहीं चुरानी चाहिए। उसे इस हकीकत से आंख मिलानी होगी कि सिर्फ चार महीनों में इन राज्यों में उसकी लहर काफूर होती नजर आई है। क्या इसलिए कि उत्तरप्रदेश की एक लोकसभा और 11 विधानसभा सीटों के उपचुनाव में उसका प्रचार अभियान विकास और सुशासन के मुद्‌दों से हट गया? इन मुद्‌दों की बदौलत ही लोकसभा चुनाव में पार्टी ने लोगों का अभूतपूर्व विश्वास जीता था। उनके विपरीत हिंदुत्व के मुद्‌दों को प्रमुखता देना कारगर साबित नहीं हुआ, यह नतीजों से साफ है। उधर, राजस्थान में भाजपा और उसकी सरकार दोनों के लिए विचारणीय है कि औद्योगिक निवेश का माहौल बनाने के अति-उत्साह में वे आम आदमी को नाराज तो नहीं कर रही हैं? पूर्व कांग्रेस सरकार द्वारा शुरू की गई मुफ्त चिकित्सा योजना जैसे कल्याणकारी कार्यों में कटौती कहीं राजनीतिक रूप से महंगी तो साबित नहीं हो रही? आखिर राजनीति के केंद्र में आम आदमी का होना अपरिहार्य है। हालांकि, श्रम कानूनों में सुधार और भूमि अधिग्रहण कानून में परिवर्तन की राज्य सरकार की पहल का निवेशक जगत में स्वागत हुआ है, मगर इससे सरकार की छवि अगर प्रतिकूल रूप से प्रभावित हुई तो भविष्य में ऐसे सुधारों को आगे बढ़ाना कठिन हो सकता है। अधिक बुनियादी सवाल यह है कि नरेंद्र मोदी सरकार ने ‘अच्छे दिन’ लाने का जो वादा किया था, क्या उसमें लोगों का यकीन घट रहा है? वरना, जिस गुजरात ने 59 प्रतिशत वोट के साथ अपनी सभी 26 लोकसभा सीटें भाजपा को दी थीं और जो तकरीबन दो दशक से पार्टी का अभेद्य गढ़ है, वहां 9 में से 3 सीटें हार जाने को किस तर्क से समझा जा सकता है? उपचुनावों के नतीजे पार्टी के उत्साह पर पानी डालने वाले हैं, लेकिन अगर उसने इनसे सही सबक लिया, तो वह अपना भविष्य संभाल सकती है। गौरतलब है कि किसी एक चुनाव में जीत को आज के दौर में कोई पार्टी अपनी स्थायी सफलता का आधार नहीं मान सकती। जनता का भरोसा जीतने के लिए सतत प्रयासरत रहना ही अब कामयाबी का सूत्र है।

संपादकीय