‘कोेनेस्टी’ मायने क्या होता है?
महान शायर कैफी आजमी की प|ी शौकत आैर उनकी बेटी शबाना आजमी की कला से सभी परिचित हैं परंतु कैफी आजमी के सुपुत्र बाबा आजमी हमेशा परदे के पीछे ही रहे हैं, यों भी सिनेमेटोग्राफर कैमरे के पीछे ही रहता है। बाबा आजमी ने दर्जनों सफल फिल्मों का छायांकन किया है आैर इंदर कुमार की अनेक फिल्मों में उनका सहयोग सराहनीय रहा है। बाबा आजमी की प|ी तन्वी भी रंगमंच पर बढ़िया काम करती रही हैं, उनकी माता ऊषा किरण कभी सार्थक फिल्में जैसे अमिया चक्रवर्ती की ‘पतिता’ की नायिका रही हैं, बहरहाल यह पूरा परिवार सृजनशील रहा है आैर शबाना के पति जावेद अख्तर भी अनेक सतहों पर सक्रिय रहे हैं तथा उनकी पहली प|ी हनी इरानी से जन्मे फरहान अख्तर एवं जोया भी सक्रिय हैं आैर सितारा हैसियत रखते हैं। इसे सिनेमा में आजमी घराना कह सकते हैं। विगत कुछ वर्षों से बाबा आजमी कैमरे के पीछे सक्रिय नहीं रहे हैं। टेक्नोलॉजी द्वारा लाए गए परिवर्तन के कारण यह मिथ्या धारणा फैल जाती है कि उस जमाने के तकनीशियन नई मशीनों का उपयोग नहीं कर पाएंगे। टेक्नोलॉजी कुछ भी करे परंतु मूलभूत सिद्धांत कि एक सेकंड में 24 फ्रेम होती है तो नहीं बदलेगा। मशीन फिल्म नहीं रचती, मशीन चलाने वाला रचता है। उसके साथ ही इसे ‘युवा युग’ प्रचारित करके अनुभव को रद्दी की टोकरी में फेंका जा रहा है।
सिनेमा ही नहीं सभी क्षेत्रों में ‘युवा वय’ को एक प्रीमियम प्रोडक्ट बना दिया गया है, एक ‘ब्ल्यू चिप’ बनाया गया है। बहरहाल बाबा आजमी ने 29 मिनिट की एक लघु फिल्म बनाई है जिसमें एक अपहरणकर्ता आैर अपहरण किए गए युवा के बीच का वार्तालाप है। बाबा आजमी ने कथा फिल्म के लिए पटकथा लिखी है परंतु वे कई कारणों से फिल्म नहीं बना रहे हैं। यह भी संभव है कि वे अपनी पटकथा की किसी गुत्थी को सुलझा नहीं पा रहे हैं। लगभग सारे सफल फिल्मकारों ने कुछ पटकथाएं बनाई परंतु फिल्मांकन नहीं किया। कवि आैर लेखक भी अपने कई विचारों को खारिज करते रहते हैं। दरअसल अपने ही काम को खारिज करना सृजन प्रक्रिया का हिस्सा है। हमारी पाचन क्रिया में भी खारिज अर्थात अस्वीकृत की महत्वपूर्ण भूमिका है। सिनेमा में तो पांच शॉट लेने पर एक ही शॉट सही मिलता है। कई बार तो पचास के बाद सही मिल पाता है। सिनेमा शास्त्र का ही कड़वा सच यह भी है कि बहुत मेहनत से लिए शॉट को भी संपादन मेज पर खारिज करना पड़ता है, क्योंकि वह फिल्म