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विधू विनोद चोपड़ा की सिनेमाई शतरंज का \"वजीर\'

7 वर्ष पहले
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विधू विनोद चोपड़ा की अंग्रेजी भाषा में बनी \\\"ब्रोकन हॉर्सेस\\\' अगले वर्ष के मध्य तक प्रदर्शित होगी। उनकी राजू हिरानी और आमिर के साथ बनी फिल्म पी.के. 19 दिसंबर को प्रदर्शित हो रही है। उनकी बिजॉय नाम्बियार द्वारा निर्देशित \\\"वजीर\\\' में अमिताभ बच्चन, फरहान अख्तर, अदिति राव हैदरी और मानव कौल अभिनय कर रहे हैं। दिल्ली में शूटिंग का पहला दौर हो चुका है, दूसरा दौर कश्मीर में होगा। ज्ञातव्य है कि उनकी \\\"मिशन कश्मीर\\\' के समय राजकुमार हिरानी उनके सहायक निर्देशक थे। ज्ञातव्य है कि \\\"वजीर\\\' पहले \\\"दो\\\' के नाम से बनाई जाने वाली थी। इस फिल्म की कथा के बारे में अभी तक कोई जानकारी नहीं है परन्तु टाइटिल तो शतरंज के खेल का है, भले ही शाब्दिक अर्थ \\\"मंत्री\\\' हो। शतरंज का खेल विधु विनोद चोपड़ा की विचार प्रक्रिया का एक हिस्सा रहा है और उनकी फिल्मों की बुनावट भी इसी खेल की तरह होती है, पात्र भी कुछ वैसी ही चाल रखते हैं। शतरंज को रूपक बनाकर विनोद चोपड़ा की फिल्मों पर शोध किया जा सकता है। हाल ही में जावेद अख्तर ने टाटा स्काई पर जारी अपने कार्यक्रम \\\"दोहे मोहे सोवे\\\' में रहीम के एक दोहे की व्याख्या की थी कि शतरंज के खेल में ऊंट ढाई घर चल सकता है, टेढ़ा चल सकता है, उसकी मार जबरदस्त है परन्तु वह कभी बादशाह के रूप में नवाजा नहीं जा सकता, जबकि प्यादा मात्र एक घर चल सकता है और सीधा ही चल सकता है, परन्तु बिसात की दूसरी ओर अंतिम \\\"घर\\\' पर पहुंचते ही उसकी ताजपोशी हो जाती है और बादशाह हो जाता है। गोयाकि साधारण व्यक्ति सरल सीधी राह पर चलकर शिखर पर पहुंच सकता है, उसकी ताजपोशी मुमकिन है परन्तु ढाई घर और टेढ़ा चलने वाले में भले ही मारक शक्ति हो लेकिन उसकी ताजपोशी मुमकिन नहीं है। शैलेंद्र की पंक्ति है \\\"सीधी राह पर चलना, देखकर उलझन, बचकर निकलना\\\' सई परांजपे की \\\"कथा\\\' कछुए और खरगोश की कथा से प्रेरित थी और वह भी सरलता, सहजता की विजय गाथा थी।

सत्यजीत राॅय ने मुंशी प्रेमचंद की कथा से प्रेरित अपनी पहली हिन्दी फिल्म \\\"शतरंज के खिलाड़ी\\\' बनाई जिसमें संजीव कुमार, शबाना आजमी और सईद जाफरी ने अभिनय किया था। गौरतलब है कि रॉय महोदय प्रेमचंद की ही \\\"सद्गति\\\' से प्रेरित फिल्म दूरदर्शन के लिए बनाई थी जिसमें एक ब्राह्मण अपने घर आए दलित से इतना परिश्रम कराता है कि उसकी मृत्यु हाे जाती है और उच्च जाति का व्यक्ति इतना संवेदनहीन हो जाता है कि उसे