खुली व्यवस्थाएं ही टिकाऊ होती हैं
सीनेट इंटेलीजेंसकमेटी द्वारा टार्चर रिपोर्ट जारी करने के समर्थक भी सहमत हैं कि इससे विदेशों में अमेरिकी हित प्रभावित हो सकते हैं और इसके विरोधियों को तो इसका पक्का यकीन है। सीनेटर टेड क्रूज के शब्दों में, ‘इससे जिंदगियां खतरे में पड़ेंगी, हमारे सहयोगी दूर हो जाएंगे और राष्ट्रीय सुरक्षा कमजोर होगी।’ किंतु क्या वाकई ऐसा होगा? क्या ऐसा हुआ है?
क्रूज की दलील वैसी ही है, जो हमें तत्कालीन सोवियत संघ के खिलाफ लड़े गए शीतयुद्ध के दिनों में सुनाई देती थी। तब कहा जाता था कि सोवियत संघ की तुलना में अमेरिका नुकसान की स्थिति में है, क्योंकि अमेरिकी संसद, कांग्रेस की ओर से हस्तक्षेप, मीडिया में कई गोपनीय अभियानों के खुलासे और लोकतंत्र की अन्य बातों की वजह से अमेरिका को पीठ पर हाथ बांधकर लड़ना पड़ता है। दूसरी तरफ मास्को तेजी से, असरदार तरीके से और पूरी गोपनीयता के साथ घातक कार्रवाई कर सकता है। यहां तक कि शांति के पैरोकार माने जाने वाले राजनेता जॉर्ज केनन भी खेद जताते थे कि बड़े, अराजक-से लोकतंत्र में विदेश नीति चलाना कठिन ही नहीं, बहुत बड़ी बाधा है।
वास्तविकता तो यह है कि तत्कालीन साम्यवादी सोवियत संघ ने पूरी तरह से विनाशकारी विदेश नीति चलाई। उसने इतनी निर्दयता से अपने ‘सहयोगियों’ का दमन किया कि 1980 का दशक आते-आते पूर्वी यूरोप में आस-पास के सारे देश इसके प्रति गहरा शत्रुता भाव रखने लगे। उसका कोई वास्तविक मित्र नहीं रहा। वह अमेरिका के साथ हथियारों की होड़ में लग गया, जिसमें सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का 10 से 20 फीसदी लग जाता था। उसने अफगानिस्तान पर हमला कर दिया और ऐसे युद्ध में फंस लिया, जिसमें वह यह स्वीकार नहीं कर सकता था कि वह हार गया है।
ये सब गलतियां ऐसी बंद व्यवस्था का नतीजा थीं, जहां कोई रोक-टोक नहीं थी। नीतियों में संतुलन लाने का कोई उपाय नहीं था। क्रेमलिन और खुफिया एजेंसी केजीबी को मनमानी करने की पूरी आज़ादी थी। उनके कामों पर कोई निगरानी नहीं रखता था। कोई उनसे सवाल नहीं पूछ सकता था। किसी अभियान को उजागर करने की कभी जरूरत महसूस की गई और कोई मीडिया था, जो उनके इन कामकाजों की रिपोर्ट देता। सबकुछ चुपचाप चलता रहता था। देश को उसका क्या नतीजा भुगतना पड़ रहा है, यह देखने वाली कोई स्वतंत्र एजेंसी नहीं थी। नतीजा यह हुआ कि गलतियां दोहराई जाती रहीं और आखिर में पूरे तंत्र की ही कमर टू