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रानीवाड़ा के किसानों को रास रही है पपीते की खेती
सिंचाईके लिए उपलब्ध मीठा पानी क्षेत्र में पपीते की खेती के लिए वरदान साबित हो रहा है, यही कारण है कि क्षेत्र के किसानाें में अब पपीते की खेती को लेकर रुझान बढ़ने लगा है। पहले जहां क्षेत्र में परंपरागत तरीके से ग्वार, बाजरा, गेहूं, जीरे, अरंडी, मुंगफली की खेती हुआ करती थी, लेकिन अब इसके साथ पपीते की खेती की ओर भी रूचि दिखाने लगे है। काश्तकार रमेश कुमार चौधरी बताते है कि इससे पहले क्षेत्र के किसान ग्वार, बाजरे मुंगफली की खेती करते थे। शेष|पेज13
जिसमेंज्यादा मेहनत होने के साथ कभी मौसम की मार तो कभी कम उपज से किसानों के लिए हाडतोड़ मेहनत वाली खेती महंगी साबित हो रही थी। धीरे धीरे किसानों का रूझान पपीते की खेती पर बढ़ने लगा इससे जहां उनकी आमदनी में वृद्धि हुई वहीं मेहनत भी कम होने लगी। काश्तकारों ने बताया कि साल के अप्रैल तथा सितंबर माह में 8 बीघा खेत में 2300 पौधों से पपीते की खेती की जाती है।
एकपेड़ से कितनी उपज : पपीतेकी खेती में प्रति पौधे पर एक क्विंटल फल लग सकते है तथा एक फसल पर दो बार फल लगते है। जिसकी बाजार कीमत 8 रुपए प्रति किलो के हिसाब से व्यापारी बोली लगाते है। इस तरह पूरे साल की आवक करीब 18 लाख रुपए तक हो सकती है।
अनुदानमिले तो बढ़े प्रोत्साहन : बागवानीकृषि खेती के तहत प्रदेश के कुछ जिलों में सरकार की ओर से किसानों को अनुदान दिया जाता है मगर जालोर जिले में अनुदान नहीं मिलने से किसानों को इसका फायदा नही मिल रहा है। जालोर जिले में कई प्रगतिशील किसान उच्च गुणवत्ता वाली पपीते की फसल तैयार कर रहे है। उनका कहना है कि अनुदान मिले तो वे इसमें और उन्नति कर सकते है।
ऐसे होती है बुवाई
किसानोंके अनुसार खेत की दो बार गहरी जुताई करने के साथ उसमें हरी घास उगा उसकी कटाई कर खेत की जमीन में मिलाई जाती है। फिर देशी गोबर की खाद वर्मी कम्पोस्ट खाद डालकर बैड बनाकर खेत तैयार करने के साथ पौधे रोपण किया जाता है। इस प्रकिया से रासायनिक खाद की जरूरत नहीं होती, क्योंकि देशी खाद में सभी पोषक तत्व होते है।
कहांबिकता है क्षेत्र का पपीता
सिरोहीके बरलूट क्षेत्र के व्यापारी स्थानीय खेतों में आकर खेतों में खड़ी पपीते की फसल देख सीजन के अनुसार भाव देते है। जिसे स्थानीय मंडियों के अलावा जोधपुर, पाली तथा पजांब, हरियाणा, राजस्थान जम्मू कश्मीर में पपीते की सप्लाई करते हैं।
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