• Hindi News
  • National
  • पहले बैलगाड़ियों से आकर मेले में खुद लगाते थे टेंट

पहले बैलगाड़ियों से आकर मेले में खुद लगाते थे टेंट

5 वर्ष पहले
  • कॉपी लिंक
बड़े-बूढ़े करने लगे कुंडली मिलान, कई रिश्ते बनेंगे यहां

खैराबादधाम में लगने वाला फलौदी माता का महाकुंभ कई मायनों में महत्वपूर्ण है। इस मेले के मेड़तवाल समाज के लोग वर्षों इंतजार करते हैं। मेला केवल मनोरंजन का होकर धार्मिक, आध्यात्मिक और सांस्कृतिक समागम का साक्षी बनता है। सिंहस्थ के बाद पहली बसंत पंचमी पर फलौदी माता का महाकुंभ लगने की यह परंपरा 228 साल पुरानी है। फलौदी माता का यह 19वां महाकुंभ है। फलौदी माता के महाकुंभ की खास बात यह है यहां पर अस्थाई आवासों में रिश्ते पक्के होते हैं। कई युवक-युवतियां इस महाकुंभ में विवाह कर सात जन्मों के साथी बनते हैं।

इतिहासकार ललित शर्मा बताते हैं कि मेड़तवाल समाज की मान्यतानुसार फलौदी माता के द्वादशवर्षीय महाकुंभ मेले की शुरुआत खैराबाद में मंदिर के निर्माण संवत् 1848 (सन 1791ईस्वी) में हुई थी। तब से हर 12 साल में यहां महाकुंभ लगता है और देशभर में रहने वाले मेड़तवाल समाज के लोग परिवार सहित यहां जुटते हैं। इसमें लोक परंपरा, संस्कृति एवं संस्कार निहित हैं। मेड़तवाल समाज के कई लोग ऐसे हैं जो अपने जीवनकाल में फलौदी माता के हर महाकुंभ में आते हैं। खैराबाद के समीप बसाए अस्थाई फलौदी नगर में बने आवासों में इस बार भी कई उम्रदराज लोग अपने परिवार सहित आए हैं। कुछ बुजुर्गों से भास्कर ने फलौदी माता के महाकुंभ को लेकर चर्चा की। उन्होंने भी अपने अनुभव साझा किए। कुछ लोग छह तो कोई सातवां महाकुंभ देख रहा है। पहले यातायात के साधन नहीं होने से लोग कई दिन पहले घरों से परिवार सहित निकल जाते थे। मुख्य रूप से बैलगाड़ियों से लोग मेले में आते थे। परिवार के युवाओं का शादी-संबंध करने के लिए पहले भी इस महाकुंभ का इंतजार किया जाता था और आज भी यह परंपरा कायम है।

खबरें और भी हैं...