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आचार्य रयणसागरजी का स्वागत किया

5 वर्ष पहले
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दिगंबरजैनाचार्य रयणसागर महाराज और उपाध्याय उदारसागर महाराज ससंघ का पाड़वा से विहार कर गुरुवार शाम को नगर में आगमन हुआ। डूंगरपुर मार्ग पर समाज के लोगों ने दोनों संतों की अगवानी की। जहां पुष्प वर्षा के बीच उनका पाद प्रक्षालन किया गया।

इसके बाद ससंघ को रात्रि विश्राम के लिए कुलदीप गांधी के प्रतिष्ठान पर ले जाया गया। इस दौरान चंद्रशेखर संघवी, नरेंद्र खोड़निया, हेमंत जैन, खुशपाल कोडिया, सुभाष कोडिया, वैभव गोवाड़िया, जिनेंद्र पंचोरी, प्राशु सहित बड़ी संख्या में समाजजन मौजूद थे। शुक्रवार सुबह संतों का नगर में मंगल प्रवेश कराया जाएगा।

आचार्यरयणसागरजी की जन्म स्थली है सागवाड़ा : आचार्यश्रीका जन्म वर्ष 1954 में सागवाड़ा में छगनलाल गांधी रुक्मणी देवी गांधी के यहां हुआ था। उनके गृहस्थ जीवन का नाम आनंद कुमार था। प्रारंभिक शिक्षा के बाद मात्र 23 वर्ष की उम्र में ही उन्होंने अपने गृहस्थ जीवन का त्याग कर संन्यास को अपना लिया था। 18 फरवरी 1979 को महाराष्ट्र के औरंगाबाद में आचार्य दयासागरजी महाराज से जैनेश्वरी दीक्षा में उन्हें रयणसागर नाम दिया। इसके बाद 1983 में पहला चातुर्मास सागवाड़ा में किया था। बाद में आचार्य रयणसागरजी द्वारा विभिन्न राज्यों में सतत् धर्म की प्रभावना की जा रही है।

चिड़ियावासा.जैनमुनि वीरसागरजी, विशाल सागरजी धवल सागरजी का गुरुवार शाम को चिड़ियावासा कस्बे में मंगल प्रवेश करने पर जैन समाजबंधुओं ने अगवानी की। इस दौरान आयोजित धर्मसभा को संबोधित करते हुए जैन मुनियों ने कहा कि धर्म से ही मानव जीवन का कल्याण होता है। इसलिए सदा धर्म से जुड़े रहें। इस अवसर पर कई समाजबंधु मौजूद रहे।

नगर में आगमन पर जैन संतों का पाद प्रक्षालन करते समाजबंधु।

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