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नरमा गेहूं-सरसों से निराश किसानों ने किया सब्जियों का रुख

5 वर्ष पहले
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{1995 से 2001 तक नरमे के खेतों में लीफ कर्ल और हरी सुंडी का प्रकोप आया।

{ पेस्टीसाइड, बीज, खाद और उर्वरकों की बेतहाशा लागत।

{ कपास की चुनाई के लिए महंगे मजदूर उनकी तलाश के लिए समय की बर्बादी।

{ सीसीआई ने समर्थन मूल्य पर ही कपास खरीदने से हाथ खींचे।

{ किसान प्राइवेट व्यापारियों एवं बिचौलियों के चंगुल में फंसने लगा था।

{ किसानों ने नरमा कपास की तरह गेहूं सरसों की फसल को भी विदाई दे दी है।

इसलिएछोड़ा गेहूं और सरसों

{गेहूं का समर्थन मूल्य लागत की तुलना में निराशाजनक।

{ गेहूं अधिक पानी से पकता है, इसलिए किसान दूसरी फसल नहीं बो सकता।

{ गेहूं में भी उर्वरक और खाद की लागत ज्यादा रहती है।

{ दूसरी फसल बुआई से पहले काफी दिनों तक खेत खाली रह जाते हैं।

{ सरसों की उपज में निरंतर गिरावट।

{ एकमात्र नकदी फसल बची जो किसान की जरूरत पूरी नहीं कर पाती।

{ पाला और सर्दियों में तापमान बढ़ने का जोखिम हर समय सताता रहता है।

35 दिन में पालक और 40 दिन में मूली : प्रगतिशीलकिसान सतविंद्र बिश्नोई के अनुसार, अब जमाना लद गया कि किसान फसल का 6 माह तक इंतजार करे। अब तो किसान उंगलियाें पर दिन गिनता है और फसल तैयार हो जाती है। उन्होंने 28 जून को मूली की बुआई की और 33 दिन बाद उखाड़कर बिक्री शुरू कर दी। मात्र दो माह की फसल से वे प्रति बीघा 50-60 हजार रुपए का मुनाफा कमा लेंगे। बिश्नोई के अनुसार बड़े किसानों को सारा काम मजदूरों से करवाना पड़ता है, इसलिए बचत कम रहती है। वरना छोटे किसानों ने इस बार मूली और पालक में इससे ज्यादा कमाई की है।

एग्रो रिपोर्टर | श्रीगंगानगर

कुछवर्षों से शहर के चारों ओर खेतों में दिखाई देने वाली परंपरागत फसलें लगभग विदाई ले चुकी हैं। अब अधिकांश किसान अपने खेतों में सब्जियों की बुआई करते हैं और अच्छा खासा मुनाफा भी कमाते हैं। शहर के चारों ओर करीब 10 हजार हैक्टेयर इलाके में सब्जियों की बंपर फसल होती है। कृषि अनुसंधान केंद्र के सामने ही चक 2 में प्रगतिशील किसान रामकुमार घोड़ेला तो खेती में नवाचार के कारण कृषि संबंधी कई पुरस्कार प्राप्त कर चुके हैं। उन्हें बेहतरीन खेती के लिए राष्ट्रपति से भी पुरस्कार मिल चुका है। एक हैक्टेयर से भी छोटे खेत में वे हर साल लाखों रुपए की सब्जियाें का उत्पादन लेते हैं। घोड़ेला के इस छोटे से खेत को कृषि की प्रयोगशाला कहा जाए तो अतिश्योक्ति नहीं होगी। उन्होंने बाड़ करेले, हल्दी, पुदीना, खीरा, हरी मिर्च, पालक और पांच सितारा होटलों की थालियाें में परोसा जाने वाला हरी पत्तियों का सलाद खेत में बीज रखा है। खेत में छोटी सी डिग्गी और सोलर पंप लगा हुआ है। इससे केवल ड्रिप एवं फव्वारा चलाकर पानी की बचत करते हैं बल्कि सोलर लाइट अपने घर को सप्लाई करते हैं। उनके खेत में सालभर पालक होता है। श्रीगंगानगर के हरी पत्तियों के सलाद ने तो नई दिल्ली और चंडीगढ़ तक पहचान बना ली है। इसी प्रकार चक 3 डी में मनोहरलाल बिश्नोई, 2 डी में गोपाराम निम्मीवाल, आलोक सहारण, मांगीलाल बिश्नोई आदि ऐसे किसान हैं जिनके पास थोड़ी-थोड़ी भूमि है, लेकिन ये सभी कुष्मांड किस्म की सब्जियों के अलावा मूली, पालक, गोभी, टमाटर, बैंगन, भिंडी आदि की अच्छी उपज लेते हैं।

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