• Hindi News
  • National
  • 317 शब्दों से नैश को मिला नोबेल आधी जिंदगी पागलपन में बीती

317 शब्दों से नैश को मिला नोबेल आधी जिंदगी पागलपन में बीती

4 वर्ष पहले
  • कॉपी लिंक
1994 मेंअर्थशास्त्र का नोबेल पुरस्कार जीतने वाले डॉ. जॉन नैश की कहानी इतनी उतार-चढ़ाव भरी है कि सिल्विया नसैर ने उन पर एक किताब लिखी- ब्यूटिफुल माइंड। इस किताब के आधार पर 2001 में हॉलीवुड में फिल्म भी बनी। इक्वलिब्रियम पॉइंट्स इन एन-पर्सन गेम्स की जिस थ्योरी के लिए उन्हें नाेबल दिया गया, वह थ्योरी एक पेज की भी नहीं है और उसमें सिर्फ 317 शब्द हैं।

उनका पूरा नाम था- जॉन एफ नैश। पिता की तरह नैश भी इलेक्ट्रिकल इंजीनियर बनना चाहते थे और इसलिए उन्होंने पीटर्सबर्ग में कार्नेगी मिलान यूनिवर्सिटी में एडमिशन भी ले लिया था। लेकिन फिर उनकी गणित में रुचि इस कदर बढ़ी कि कार्नेगी से मैथमेटिक्स में डिग्री लेकर निकले। 1948 में वे पोस्टग्रेजुएशन डिग्री लेने के लिए जब प्रिंस्टन यूनिवर्सिटी पहुंचे तो उनके पूर्व प्रोफेसर रिचर्ड डफिन ने उनके लिए एक लाइन का रिकमन्डेशन लेटर लिखा था- यह आदमी जीनियस है।

नैश की पहचान यहां एक अक्खड़ के रूप में बन रही थी। उनकी आदतें अजीब थीं और लोगों को इन पर आश्चर्य भी होता था। वे अक्सर सीटी बजाते रहते। बहुत तेज चलते थे और कई बार बातचीत बीच में ही छोड़कर निकल जाते थे। प्रिंस्टन से डॉक्टरेट के बाद नैश ने एमआईटी में इंस्ट्रक्टर के रूप में जॉब शुरू किया। 1957 में उन्होंने एलिसिया लार्डे से शादी की। दो साल बाद वे पिता बनने वाले थे, लेकिन इस खुशी के आने के पहले एक अजीब उलझन शुरू हो गई। उनकी विलक्षणता उनके लिए नुकसानदायक साबित होने लगी। वे पागलपन और अजीब दुविधाओं का शिकार होने लगे। इसी साल अप्रैल में उन्हें बोस्टन के बाहर मैकलीन अस्पताल के साइकेट्रिक वार्ड में भर्ती किया गया। उनकी स्थिति में गिरावट जारी रही।

इस बीच उनकी गेम थ्योरी लगातार पॉपुलर होती जा रही थी। यह थ्योरी कोर्स में भी गई। जब यह सब हो रहा था नैश प्रोफेशनल दुनिया से गायब थे। लेकिन परिवार लगातार उनके साथ बना रहा। हालांकि उनके व्यक्तिगत जीवन में उलझने बढ़ रही थीं। प|ी ने उन्हें 1963 में तलाक दे दिया था। फिर भी वे उनके साथ बनीं रहीं और 1970 में उन्हें अपने साथ रहने के लिए अपने घर ले गईं। तलाक के 38 साल बाद 2001 में इस जोड़े ने एक बार फिर शादी की। 1990 में नोबेल पुरस्कार समिति ने पड़ताल शुरू की कि क्या डॉ. नैश को अर्थशास्त्र का नोबेल दिया जा सकता है, तब तक उनकी बीमारी कम होने लगी थी। 1996 में उन्होंने एक साथी डॉ. कोहन को एक मेल किया था, इसमें लिखा कि मैं अपनी अजीब मानसिक स्थिति से आखिर निकल रहा हूं। यह दवाओं का नहीं उम्र के साथ होने वाले हार्मोनल परिवर्तनों का असर है। डाॅ. कोहन और अन्य लोगों ने नोबल पुरस्कार समिति को विश्वास दिलाने की कोशिश की कि नैश पुरस्कार स्वीकार करने के लिए अच्छी स्थिति में हैं। कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी के इकोनॉमिस्ट जॉन सी हर्सान्यी और जर्मनी की रेनिसेज फ्रेडरिक-विल्हेम्स-यूनिवर्सिटी के अर्थशास्त्री रेनहाल्ड सेल्टन के साथ उन्हें यह पुरस्कार दिया गया।

} इलेक्ट्रिकलइंजीनियर बनना चाहते थे, बने गणितज्ञ अर्थशास्त्री

}तलाक के 38 साल बाद पूर्व प|ी से फिर की शादी

} इनकेजीवन की कहानी पर बनी फिल्म ब्यूटिफुल माइंड

खबरें और भी हैं...