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फिल्म में चार महिलाओं की डिज़ायर और डिनायल

4 वर्ष पहले
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प्रकाश झाने ‘दामुल,’ ‘मृत्युदंड’ और ‘गंगाजल’ जैसी साहसी फिल्मों का निर्माण किया है परंतु लोकप्रिय सितारे रणबीर कपूर, कैटरीना कैफ और नाना पाटेकर अभिनीत ‘राजनीति’ के साथ ही वे अपनी मूलधारा से विलग हो गए परंतु अपनी सहायक रही अलंकृता श्रीवास्तव की फिल्म ‘लिपस्टिक अंडर माय बुर्का’ में वही प्रखर तेवर नज़र आते हैं। कभी-कभी शिष्य भी गुरु को उसका भूला हुआ मार्ग याद दिला देता है। अलंकृता श्रीवास्तव की फिल्म अत्यंत साहसी है। यह अलग वय, धर्म और आर्थिक वर्गों से आई चार महिलाओं की इच्छाओं की व्यथा-कथाएं प्रस्तुत करती हैं। इन चार महिलाओं के स्वाभाविक डिज़ायर पर समाज की जड़ सोच द्वारा आपत्ति उठाई जाती है गोयाकि डिज़ायर की बोतल पर समाज की रूढ़ियों का ढक्कन लगा होता है और यह फिल्म उस ढक्कन के तड़क जाने पर कांपते हुए समाज के दोहरे मानदंड को उजागर करती है। किंवदंतियों में भी बोतल में बंद जिन्न की रोचक कथाएं होती हैं। बोतल को प्रतीक इसलिए बनाया गया है कि उसमें बंद पानी और बहते पानी में अंतर होता है। कालाबाजार में शैलेंद्र की पंक्तियां हैं, ‘थम गया पानी, जम गई काई, बहती नदिया ही साफ कहलाईं।’

इस फिल्म में अर्थ की अनेक सतहें हैं, मसलन बाजार की ताकतें एक पुरानी हवेली को तोड़कर वहां आधुनिक मॉल बनाना चाहती है और हवेली की उम्रदराज मालकिन हवेली बेचना नहीं चाहती गोयाकि वह उन परम्पराओं को बचाए रखना चाहती है, जिसकी प्रतीक है वह हवेली। वह स्वयं अपने शरीर के स्वाभाविक डिज़ायर को जीती भी है। इस तरह फिल्मकार यह रेखांकित कर रही है कि डिज़ायर स्वाभाविक है और उसकी मांग पर चलने से कोई स्वस्थ परम्परा धराशायी नहीं होती। डिज़ायर तो समाज रूपी हवेली की नींव है परंतु लोकप्रिय बातों ने उस नींव को कभी स्वीकार ही नहीं किया। डिज़ायर को तथाकथित डिसीप्लीन के विरुद्ध बताया जाना भ्रांति है। फिल्म में यह भी दिखाया गया है कि केंद्रीय पात्र की महिला कुछ ऐसी किताबें पढ़ती हैं, जिसका प्रकाशन भी प्रतिबंधित है। दरअसल, सेक्स को प्रतिबंधित बनाकर इस तरह के वाहियात प्रकाशन का उद्योग ही खड़ा हो गया है। र|ा पाठक शाह द्वारा अभिनीत अधेड़ अवस्था की महिला इन किताबों को पढ़ती हैं। ज्ञातव्य है कि स्वीडन में पॉर्नोग्राफी जायज है। यह पर्यटन व्यवसाय को पल्लवित कर रहा है। स्वीडन निवासी स्वयं इस बाजार के ग्राहक ही नहीं है।

इस फिल्म में खाड़ी देश में नौकरी करने वाला एक पात्र है, जो वर्ष में एक बार छुटिट्यों में घर आता है और प|ी के शरीर को ऐसे रौंदता है मानो वह फर्श पर बिछी जाजम है। वह ज़हालत का प्रतिनिधित्व करता है। उसके हमबिस्तर होेने के दृश्य में भी उसके कार्यकलाप मशीनवत चलते हैं वह इसे अपनी छुटि्टयों का सैर-सपाटा ही मानता है। अनेक क्षेत्रों में हम मनुष्य का मशीन बनते जाना देख रहे हैं।

बहरहाल अलंकृता श्रीवास्तव की यह फिल्म अनेक सतहों वाली फिल्म है। पूरी फिल्म उन्होंने प्याज के छिलके उतारने की तरह रची हैै। पुरुष इस मामले में महिला से कितना भयभीत है- यह तथ्य भी एक दृश्य में उजागर होता है जब प्रेमिका अपने प्रेमी से कहती है कि उन दोनों को भाग जाना चाहिए और प्रेमी इनकार कर देता है। उसे उसके साथ हमबिस्तर होना पसंद है परंतु वह कोई उत्तरदायित्व नहीं लेना चाहता। सेक्स महज अधिकार नहीं, वह एक उत्तरदायित्व भी है। फिल्म में स्थिर छायांकन करने वाला एक महत्वपूर्ण पात्र है, जो शादी के एलबम बनाने में विशेष योग्यता रखता है परंतु शादी नहीं करना चाहता गोयाकि वह गुड खाता है, गुलगुले से उसे परहेज है। यह साहसी फिल्म अरुणा राजे की ‘रिहाई’ की श्रेणी की फिल्म है। इस फिल्म के निर्माता प्रकाश झा का प्रिय विषय राजनीति है और उनकी शिष्या ने शयन-कक्ष की कूटनीति को उजागर करने वाली फिल्म बनाई है।

जयप्रकाश चौकसे

फिल्मसमीक्षक

jpchoukse@dbcorp.in



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