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चांद तारों के तले रात ये गाती चले, शैलेंद्र का शाश्वत सत्य

6 वर्ष पहले
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राज कपूर की ‘श्री 420’ में गीत ‘रमैया वस्तावैया’ में एक पंक्ति है, ‘चांद तारों के तले रात ये गाती चले।’ संगीतकार शंकर हैदराबाद के रहने वाले थे और अपनी धुनों के डमी बोल में प्राय: दक्षिण भारत की भाषाओं के शब्दों का इस्तेमाल करते थे। राज कपूर को ‘रमैया वस्तावैया’ शब्द इतने सुरीले लगे कि उन्होंने रिकॉर्डिंग में भी इन शब्दों को जस का तस रखा। इसी लोकप्रिय गीत में एक पंक्ति , ‘चांद तारों के तले रात ये गाती चले।’

आज गीत के बनने के साठ वर्ष बाद ये पंक्तियां इसलिए याद आईं कि बोस्टन के विज्ञान शोध से खबर जारी हुई है कि तारे खामोश नहीं रहते हैं, उनसे ध्वनियां निकलती हैं, जिन्हें प्रयोगशाला के यंत्रों की मदद से मनुष्य सुन सकता है। आज से लगभग सौ वर्ष पहले महान वैज्ञानिक अल्बर्ट आइन्स्टीन ने यह भविष्यवाणी की थी कि तारे खामोश नहीं रहते, उनसे ध्वनियां निकलती हैं। अंतरिक्ष ध्वनिविहीन नहीं है, उसमें चांद, तारों इत्यादि से आवाजें निकलती हैं, जिन्हें उपकरणों की सहायता से सुना जा सकता है। अब आइन्सटीन की रिलेटिविटी का सिद्धांत अपने में निहित अनंत संभावनाओं के साथ धीरे-धीरे उजागर हो रहा है और गुरुत्वाकर्षण की तरंगों में भी संगीत ध्वनियां मौजूद हैं। कुछ वर्ष पूर्व राकेश रोशन की एक विज्ञान फंतासी में ‘ओम’ के उच्चारण को अंतरिक्ष में सुना जा सकता है- इस तरह की बात थी।

दरअसल, लेखक एच.जी. वेल्स विज्ञान फंतासी के जनक हैं और उनकी अनेक कल्पनाएं कालांतर में यथार्थ स्वरूप में साकार हुई हैं। एच.जी. वेल्स ने मशीन, मानव, रोबो पर कई कहानियां लिखी हैं। इसी विज्ञान फंतासी विधा के जूल्स वर्न की ‘जर्नी टू मून’ और ‘जर्नी टू सेंटर ऑफ अर्थ’ से प्रेरित विज्ञान फंतासी फिल्में विदेशों में रची गई हैं और ये अत्यंत सफल फिल्में सिद्ध हुई हैं। ‘स्टार ट्रैक’ टेलीविजन सीरियल में भी बताई गई कई बातें आज रोज के जीवन की हकीकत है। आश्चर्य की बात यह है कि जिन्हें कभी कोरी कल्पनाएं माना जाता था, वे आज यथार्थ स्वरूप ग्रहण कर रही हैं। सच तो यह है कि मनुष्य जितना अधिक अनुसंधान करके जानने लगता है, उसे उतनी ही अपने ज्ञान की कमी भी समझ में आने लगती है। मूर्ख व्यक्ति ही मुतमइन रहता है कि वह सब जानता है। ज्ञान संधान में नई बातों को जानने के साथ ही हमें अपने अज्ञान की सीमाओं का भी अनुमान होता है।

सितारों को सदियों से हम देख रहे हैं और भविष्य में उन्हें सुन भी पाएंगे। हमें यह भी समझना चाहिए कि खगोल शास्त्र और ज्योतिष में बहुत अंतर है। जन्म के क्षण में अंतरिक्ष में सितारों और नक्षत्रों की स्थिति से मनुष्य के भाग्य को बांचने के प्रयास हो रहे हैं, परन्तु हकीकत को शैलेन्द्र ने कहीं यूं बयान किया है ‘चिठिया (पत्र) हो तो हर कोई बांचे, भाग बांचा जाए’। भाग्य बांचने की इच्छा आदिकाल से मनुष्य की कमजोरी रही है और इसका लाभ उठाकर कई लोगों ने अवाम को खूब ठगा है। यह धंधा शायद विश्व का सबसे पुराना व्यवसाय रहा है।

जीवन की अनिश्चितता इस सारे गोरखधंधे की जड़ में मौजूद है। जो पहले ही बांच लिया जाये, वह भाग्य नहीं और भविष्य भी नहीं है। जीवन की सारी रोचकता उसके अनिश्चित होने में निहित है। यह अपने में कितनी अजीब बात है कि यथार्थ की कुंजी कल्पना में खोजी जा रही है। यह भी गौरतलब है कि ‘ग्रेविटेशनल वेव ऑब्जर्वेटरी’ में गुरुत्वाकर्षण की ध्वनियों के अध्ययन की प्रक्रिया में ही यह ज्ञात हुआ है कि सितारों से भी ध्वनियां निकलती हैं। गुरुत्वाकर्षण वह चुम्बकीय ताकत है, जो चीजों को धरती की ओर खींचती हैं तथा इसी प्रक्रिया से खगोल शास्त्र भी जुड़ा है।

वर्षा ऋतु के प्रारंभ के कुछ समय पूर्व ही कुछ पौधों में फूल पनपते हैं। सावनी एक ऐसा ही फूल है। अब ज़रा गौर कीजिए कि आकाश में मेघ की पूर्व सूचना धरती से उग रहे सावनी को कैसे मिलती है कि वर्षा होने वाली है अत: सावनी खिलना चाहिए। पौधे की जड़ जमीन में है और बादल आकाश में छाते हैं, अब भला जमीन में गड़ी जड़ों को आकाश में छाने वाले बादलों की पूर्व सूचना कैसे मिलती है? संभवत: यह रिश्ता और भाषा, प्यास का रिश्ता प्यास की भाषा है। हमारे सौर अनुसंधानों के बीच हमें मनुष्य की भूख और प्यास को नज़रअंदाज नहीं करना चाहिए। सारे ज्ञान अनुसंधान की ऊर्जा इसी प्यास भूख से जुड़ी है। जब शोधकर्ता अनुसंधान करने वाले पूंजी के दास हो जाएं तो भूख और प्यास घट नहीं सकती। jpchoukse@dbcorp.in

परदे के पीछे